दुर्ग(अमर छत्तीसगढ) 29 दिसम्बर। छत्तीसगढ़ के दुर्ग जिले में पुलिस की मनमानी और सत्ता के दुरुपयोग का एक बड़ा मामला 33 साल बाद सामने आया है। आत्महत्या के झूठे केस में फंसाकर 993 दिन तक जेल भेजे गए शहर के व्यापारी प्रदीप जैन को आखिरकार न्याय मिला है।
अदालत ने न सिर्फ उन्हें दो मामलों में दोषमुक्त किया। बल्कि क्षतिपूर्ति देने के भी निर्देश दिए। इस मामले में क्षतिपूर्ति की पूरी राशि 13 लाख रुपए तत्कालीन भिलाई पदस्थ थाना प्रभारी एमडी तिवारी से वसूली गई है।
बिलासपुर हाईकोर्ट ने सुनवाई के बाद माना कि टीआई ने दुर्भावनापूर्वक व्यापारी को झूठे प्रकरण में फंसाया था। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि ऐसी स्थिति में या तो राज्य सरकार क्षतिपूर्ति दे या फिर दोषी अधिकारी से राशि वसूल कर पीड़ित को दी जाए। इसके बाद जिला प्रशासन ने कार्रवाई करते हुए टीआई की संपत्ति की जांच कराई।
नीलामी की प्रक्रिया शुरू होने से पहले ही टीआई ने तहसीलदार के पास 13.40 लाख रुपये का डिमांड ड्राफ्ट जमा कर दिया, जिसे 17 दिसंबर को कोर्ट में जमा कर दिया गया। अब व्यापारी को क्षतिपूर्ति की राशि मिलने का रास्ता साफ हो गया है।
पीड़ित व्यापारी के वकील सुधीर पांडे ने बताया कि मामला वर्ष 1992 का है। प्रदीप जैन की भिलाई के सेक्टर क्षेत्र में साइकिल की दुकान और रूआबांधा इलाके में दूध डेयरी थी। उसी दौरान उनके छोटे भाई की पत्नी ने आत्महत्या कर ली थी। मामले की जांच भिलाई नगर थाना पुलिस कर रही थी और तत्कालीन सीएसपी आरपी शर्मा के प्रभार में प्रदीप जैन समेत कई लोगों को आरोपी बनाया गया।
प्रदीप को गिरफ्तार कर दुर्ग से पकड़ा गया। इतना ही नहीं, व्यापारी को नुकसान पहुंचाने के लिए उसकी डेयरी तोड़ दी गई और वहां बंधी 35 भैंसों को भी छोड़ दिया गया। प्रदीप जैन को करीब 993 दिन जेल में बिताने पड़े। रिहाई के बाद उन्होंने हाईकोर्ट में क्षतिपूर्ति के लिए अपील दायर की।
जिला प्रशासन की ओर से पैरवी कर रहे वकील गिरीश शर्मा ने बताया कि विस्तृत सुनवाई के बाद हाईकोर्ट ने माना कि पुलिस की कार्रवाई दुर्भावनापूर्ण थी और इसके लिए दोषी तत्कालीन टीआई एमडी तिवारी हैं। कोर्ट ने क्षतिपूर्ति की राशि ब्याज सहित देने का आदेश दिया। इसके बाद वसूली का प्रकरण दुर्ग कलेक्टर कोर्ट में प्रस्तुत किया गया।
कलेक्टर अभिजीत सिंह के निर्देश पर बिलासपुर प्रशासन ने टीआई की संपत्ति चिन्हित कर जांच की। संपत्ति की कुर्की और नीलामी से पहले ही टीआई ने पूरी राशि जमा कर दी। यह मामला न सिर्फ एक व्यक्ति को मिले न्याय का उदाहरण है। बल्कि पुलिस की जवाबदेही तय करने वाला एक अहम फैसला भी माना जा रहा है।

