जैन धर्म की विशेषता आत्मा की स्वंय खोज करना सत्य मे जीना, हर जीव से मैत्री संबंध रहे- श्री श्रुतप्रभ जी

जैन धर्म की विशेषता आत्मा की स्वंय खोज करना सत्य मे जीना, हर जीव से मैत्री संबंध रहे- श्री श्रुतप्रभ जी

ब्यावर राजस्थान (अमर छत्तीसगढ़) 8 मार्च।
आचार्य श्री रामेश के शिष्य शासन दीपक श्री श्रुतप्रभ जी म सा ने समता भवन मे नियमित भगवान महावीर के प्रवचन की श्रृखंला से बताया भगवान महावीर ने कहा पूरे लोक मे नबे हजार धर्म हे उसमे से सबसे श्रेष्ठ धर्म जैन धर्म को बताया इसकी अपनी विशेषता होती आत्मा की स्वंय खोज करो, यह सत्य मे जीने वाला धर्म है जो आत्मा से प्रकट होता है।


म सा ने कहा पहले भगवान ने सत्य को स्वंय मे उतारा और पालन किया फिर लोगों को निर्देश उपदेश दिया था। जो सोच जैन धर्म मे होती हे वह अन्य धर्म मे नही होती क्योंकि भगवान सभी जीवो को आपस मे जोडकर उन्हे खुश रखना चाहते थे।


म सा ने बताया आत्मा मे भोतिक गुण प्रकट होने पर वह सत्य होता है भगवान महावीर ने साढे बारह वर्ष तक आत्मा की खोज मे लगा दिये। खोज करने सत्य मे जीते रहे जैसे मरुदेवी माता ने सत्य का दर्शन करते ही मोक्ष हो गया उन्होंने कभी तप भी नही किया था। जहां विकार हटेगा वहां सत्य प्रकट होगा।


म सा ने कहा जैन धर्म मे भावो का महत्व है अन्य धर्म मे द्रव्य का होता है। वह परमात्मा को परमात्मा मानते है जैन धर्म मे आत्मा ही परमात्मा होती है, सही दृष्टि वाला हर जीव को आत्मा के रुप मे देखते है हमारा भी एक ही लक्ष्य हो सभी जीवो से मैत्री संबंध हो हर जीव को भावो से जोडना होगा।


इससे पहले साध्वी श्री प्रखर श्रीजी म सा ने कहा हमे तीर्थंकर देवो की अराधना करनी चाहिए तभी धर्म रहेगा, उनकी कृपा से आज हम सुरक्षित है अगर उन्होंने धर्म नही बताया होता तो आज हम कहां होते,भारत ऋषि मुनियो की वजह से सुरक्षित है, चतुर्विद संघ ही जिनशासन को आगे बढाता है।


म सा ने कहा एक नवकार मंत्र की पहली लाइन णमो अरिहंताणं बोलने से करोड केवली भगवान को वंदन हो जाता है। हमे अरिहंत भगवान का बहुमान करना चाहिए उनके गुणो हे उनका स्वरुप समझना होगा। उनके गुणो का कथन करने से मन के विचार वहां का माहोल शांत हो जाते तभी हमारा मन पवित्र होता जायेगा।


संघ प्रवक्ता
नोरतमल बाबेल
साधुमार्गी जैन संघ, ब्यावर।

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