पुलिस कर्मियों पर हमले पर हाईकोर्ट का बड़ा फैसला : 26 साल पुराने मामले में कोर्ट ने दोषियों की सजा की कम, पढ़िए पूरा मामला

पुलिस कर्मियों पर हमले पर हाईकोर्ट का बड़ा फैसला : 26 साल पुराने मामले में कोर्ट ने दोषियों की सजा की कम, पढ़िए पूरा मामला

बिलासपुर(अमर छत्तीसगढ़) 29 मार्च । छत्तीसगढ़ में साल 2000 में शराब माफिया द्वारा पुलिस पर किए गए जानलेवा हमले के मामले में अब 26 साल बाद हाईकोर्ट ने अहम फैसला सुनाया है। कोर्ट ने आरोपियों की सजा को कम जरूर किया, लेकिन उनके दोषी होने को बरकरार रखा है।

आपको बता दें कि, 13 अगस्त 2000 को जीआरपी चौकी चरौदा दुर्ग को सूचना मिली कि रेलवे स्टेशन के डिपार्चर यार्ड के पास अवैध शराब बेची जा रही है। सूचना मिलते ही दो आरक्षक योगेंद्र सिंह और परमानंद भोई मौके पर पहुंचे। वहां कुछ लोग शराब के कार्टून उतार रहे थे।

पुलिस को देखते ही आरोपी पहले भाग निकले, लेकिन थोड़ी देर बाद 6-7 साथियों के साथ दोबारा लौटे और पुलिस पर हमला कर दिया। आरोपियों ने पुलिसकर्मियों पर चाकू, डंडे और लाठी से हमला किया।

आरक्षक योगेंद्र सिंह के पेट, पसलियों और सिर पर चाकू से वार किए गए। परमानंद भोई के पेट में चाकू मारा गया। अन्य आरोपियों ने लाठी, डंडे और हाथ-मुक्कों से मारपीट की। हमले के बाद आरोपी मौके से शराब के कार्टून लेकर फरार हो गए।

दोनों घायल पुलिसकर्मियों को पहले दुर्ग अस्पताल और फिर भिलाई सेक्टर-9 अस्पताल में भर्ती कराया गया। ट्रायल कोर्ट ने आरोपियों को विभिन्न धाराओं में दोषी मानते हुए सजा सुनाई थी। धारा 307 (हत्या का प्रयास), धारा 395 (डकैती), धारा 148, 324 आदि में 7 साल तक की सजा और जुर्माना शामिल था।

हाईकोर्ट ने मामले की सुनवाई के बाद कहा कि, आरोपियों ने मिलकर पुलिस पर हमला किया। उनका उद्देश्य जब्त शराब को छीनना था। यह गैरकानूनी जमावड़ा और डकैती का मामला बनता है।

हालांकि कोर्ट ने परिस्थितियों को देखते हुए सजा में राहत दी। 7 साल की सजा घटाकर 4 साल कर दी गई। धारा 397 (खतरनाक हथियार से डकैती) से बरी किया। अन्य धाराओं में दोष बरकरार रखा।

कोर्ट ने यह भी माना कि घटना को 26 साल बीत चुके हैं और आरोपी अब मध्य आयु के हो चुके हैं, इसलिए सजा में कमी उचित है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि अगर 5 या उससे ज्यादा लोग मिलकर अपराध करते हैं, तो भले ही कुछ आरोपी फरार हों, फिर भी डकैती (धारा 395) का मामला बनता है।

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