वीर बर्बरीक ने दिया श्री कृष्ण को शीश का दान एवं कहलाये खाटू श्याम… माता-पिता के ऋण से उऋण होना असंभव है – पंडित अर्पित भाई शर्मा

वीर बर्बरीक ने दिया श्री कृष्ण को शीश का दान एवं कहलाये खाटू श्याम… माता-पिता के ऋण से उऋण होना असंभव है – पंडित अर्पित भाई शर्मा

राजनांदगांव(अमर छत्तीसगढ़) 29 मई 2026 । खाटू श्याम लखदातार सेवा समिति द्वारा पावन पुरुषोत्तम मास के अवसर पर पांच दिवसीय श्री श्याम महोत्सव के चतुर्थ दिवस श्री श्याम चरित्र कथा की मीमांसा करते हुए व्यासपीठ पर विराजित अंचल के सुप्रसिद्ध भगवताचार्य पंडित अर्पित भाई शर्मा ने कहा कि श्रीमद् भागवत कथा में परीक्षित को पता था कि मेरी मृत्यु 7 दिन में होगी और वह श्रीमद् भागवत कथा का श्रवण कर मृत्यु के भय से मुक्त हो जाता है ।

हमारी मृत्यु भी इसी सात दिन के किसी दिन में होने वाली है किंतु हम भक्ति ,भजन , ज्ञान , कथा में मन नहीं लगा पाते । प्रत्येक व्यक्ति के हृदय में नंदनंदन का वास होता है आवश्यकता है उसके बोध की ।
कथा व्यास पंडित अर्पित भाई ने कहा कि जीवन में कर्म की प्रधानता है जैसा कर्म होगा वैसा फल प्राप्त होता है । पृथ्वी गोल है कर्म घूम कर वापस आते हैं । पेड़ पौधे स्थिर लगते हैं किंतु उनमें सूक्ष्म चेतना होती है तभी वह धीरे-धीरे बड़े हो जाते हैं । कर्म के साथ भाग्य भी होता है हम कर्म रूपी बीज बोते हैं वह प्रस्फुटित होकर बढ़ते हैं । छोटे पाप – पुण्य का फल इसी जन्म में एवं बड़े कर्म के फल के लिए दूसरा जन्म लेना पड़ता है । प्रभु श्री राम को भी पूर्व जन्म में किए कर्म का फल भोगना पड़ा था ।

कर्म करके मनुष्य देव भी बन सकता है एवं असुर भी बन सकता है । कर्म निष्काम भाव से करें फल की इच्छा ना करें ना ही आशा करें । अन्यथा दुख की प्राप्ति होती है आशा करना ही परम दुख का कारण है एवं उसका अधोपतन हो जाता है । पंडित अर्पित भाई ने कहा कि कहावत है “काशी का मरण भला” एवं “वृंदावन की रज भली” लगती है ।

गीता में भगवान कृष्ण ने कहा कि तुम मेरी शरण में चले आओ मैं तुम्हें सभी पापों से मुक्त कर दूंगा । हम प्रभु का नाम लेकर कथा श्रवण करके पुण्य के भागी बन सकते हैं । मुक्ति एवं मोक्ष की मीमांसा करते हुए कहा कि साधना रूपी कर्म से ही परमेश्वर की प्राप्ति होती है । इच्छाओं के रहते अगर प्राण छूट जाए तो वह मृत्यु है किंतु प्राण के रहते इच्छा समाप्त हो जाए तो वह मोक्ष है ।

प्रत्येक भक्त के हृदय में यह भाव रहता है कि मृत्यु होगी तो प्रभु का साक्षात्कार होगा , वही सांसारिक व्यक्ति मृत्यु से भय खाता है । कथा प्रसंग को आगे बढ़ते हुए श्री शर्मा ने कहा कि माता-पिता के ऋण से उऋण होना असंभव है । प्रत्येक व्यक्ति का धर्म है कि वह अपने माता पिता की आज्ञा का पालन करते हुए उनकी सेवा जीवन पर्यन्त करे ।

प्रभु श्री राम ने अपने पिता की आज्ञा पालन करते हुए चौदह वर्ष वनवास में व्यतीत किए थे । आज वृद्धाश्रमों में बुजुर्गों की बढ़ती संख्या चिंता का विषय है । हमे इस ओर ध्यान देना चाहिए ।
कथा व्यास पंडित अर्पित भाई ने कहा कि खाटू श्याम जी के एक अनन्य सेवक श्री श्याम बहादुर जी हुए हैं जिनकी मोर छड़ी के चमत्कार देखने एवं सुनने को मिलते हैं । कथा प्रसंग को आगे बढ़ते हुए पंडित अर्पित भाई ने कहा कि पौराणिक काल में भगवान शिव ने अनेक असुरों को वरदान देकर बलशाली बना दिया था देवगण इन दैत्यों की हरकतों से परेशान होकर ब्रह्मा जी के पास गए । वहां यक्षराज ने कहा कि मैं सारे दैत्यों को समाप्त कर दूंगा ।

इस बात से क्रोधित होकर ब्रह्मा जी ने उस यक्षराज का शीश धड़ से अलग कर दिया , तब भगवान विष्णु ने उसे यक्षराज के शीश को यह वरदान दिया कि द्वापर युग में तुम्हारा जन्म बर्बरीक के नाम पर होगा और तुम्हारे शीश की पूजा सदैव होती रहेगी । वहीं यक्षराज बाद में घटोत्कच के यहां बर्बरीक के नाम पर जन्म लेते हैं एवं भगवान कृष्ण के कहने पर अपने शीश का दान करते हैं।
वीर बर्बरीक की तपस्या एवं शीश का दान
कथा व्यास पंडित अर्पित भाई ने कहा कि वीर बर्बरीक ने अपने माता-पिता एवं भगवान कृष्ण का आशीर्वाद प्राप्त कर महीसागर तीर्थ गुप्त क्षेत्र में जाकर और तपस्या प्रारंभ की । तीन वर्ष तक एक पैर में खड़े होकर एवं वायु का आहार प्राप्त कर कठिन तपस्या से देवी मां को प्रसन्न किया ।

तब देवी ने धनुष एवं तीन बाण प्रदान करते हुए कहा कि केवल एक बाण से ही तीनों लोकों में विजय प्राप्त हो जाएगी । वरदान प्राप्त कर वीर बर्बरीक अपनी माता मोरवी के पास आए । वहां पिता को ना देख कर माता से पिता के संदर्भ में पूछा ।

तब माता ने बताया कि महाभारत का भीषण युद्ध प्रारंभ हो रहा है एवं तुम्हारे पिता घटोतकच युद्ध भूमि में तुम्हारे दादा की ओर से युद्ध करने गए हुए हैं । तब वीर बर्बरीक ने भी युद्ध में जाने की इच्छा व्यक्त की ।

माता मोरबी ने उसे एक वचन देने को कहा और कहा कि जो पक्ष युद्ध में हार रहा होगा तू उसका साथ देना । धनुष एवं तीनों बाण को लेकर वीर बर्बरीक नीले घोड़े पर सवार होकर युद्ध भूमि की ओर निकल पड़े । कौरव एवं पांडवों ने उसके पास आकर पूछा कि तुम कौन हो ।

तब उसने अपना परिचय देते हुए बताया कि मैं भीम के पुत्र घटोत्कच का पुत्र हूं एवं मेरी माता के वचन के अनुसार मैं युद्ध में हारने वाले के पक्ष की ओर से युद्ध करूंगा एवं अपने तीन बाण के संदर्भ में बताया । कौरव वहां से चले गए । भगवान कृष्ण ने उनकी परीक्षा लेने के लिए पीपल के सारे पत्तों को एक बाण से भेदन के लिए कहा ।

वीर बर्बरीक ने देवी मां का ध्यान करते हुए एक बाण धनुष पर चढ़ाया और तीर छोड़ दिया वह तीर उस वृक्ष के सारे पत्तों को भेदन करते हुए श्री कृष्ण के चरणों के पास आकर रुक गया तब वीर बर्बरीक ने कहा कि देवी मां के वरदान अनुसार यह तीर जब तक जिस लक्ष्य को लेकर छोड़ गया है वह पूरा नहीं करेगा तब तक वापस नहीं होगा तब भगवान कृष्ण ने अपना पैर हटाया तो उसके नीचे से एक पीपल पत्ता भेदन किया हुआ दिखा ।

भगवान कृष्ण ने विचार किया कि वीर बर्बरीक की प्रतिज्ञा के अनुसार हारने वाले का साथ देना निश्चित है , ऐसे में युद्ध का परिणाम गलत हो जाएगा । तब विचार किया कि इस युद्ध भूमि में युद्ध के पूर्व एक बलि दिया जाना आवश्यक है तीन ही व्यक्ति की बलि दी जा सकती है ।

पहले स्वयं कृष्ण , दूसरा अर्जुन एवं तीसरा वीर बर्बरीक । पूर्व जन्म में यक्षराज को दिए वचन के अनुसार भगवान कृष्ण ने बर्बरीक की बलि देने का निश्चय किया एवं बर्बरीक के समक्ष आकर कहा कि यह युद्ध भूमि की देवी बलि मांग रही है ।

वीर बर्बरीक ने आज्ञा देने को कहा तब भगवान कृष्ण ने उसे अपने शीश का दान करने को कहा । तुरंत वीर बर्बरीक ने अपनी कटार निकाल कर अपना शीष धड़ से अलग कर शीश को श्रीकृष्ण के हाथ में दे दिया ।

उसी समय 14 देवियाँ प्रकट हुई और तब भगवान कृष्ण ने कहा कि इस शीश को अमृत स्नान कराकर अमर कर देवे । अमर शीश ने 18 दिवस तक युद्ध देखा एवं बाद में उस शीश को नदी में प्रवाहित कर दिया गया । जो बहते बहते खाटू नगरी के समीप एक खेत में जाकर रुक गया।

वहां गाय चरने के लिए आती थी , एक गाय का दूध उस स्थान पर अपने आप निकल जाता था जिस स्थान पर वह शीश रखा हुआ था । कालांतर में उस नगरी के राजा को स्वप्न में हुआ , और राजा ने उस स्थान को जाकर खुदवाया एवं शीश निकाल कर भव्य मंदिर की प्राण प्रतिष्ठा की ।

आज पूरे विश्व में करोड़ों भक्त श्याम प्रभु को “शीश के दानी” “हारे का सहारा” “लीले का असवार” “मोरबी नंदन” के नाम से पुकारते हैं एवं खाटू नगरी जाकर अपनी मनोकामना पूर्ण करते हैं । इस प्रकार खाटू श्याम जी के अनेक चमत्कारों का वृतांत बताते हुए श्री श्याम चरित्र कथा को विराम दिया ।

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