बिलासपुर(अमर छत्तीसगढ़) 3 अगस्त । छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने कथित अवैध हिरासत के बदले पांच लाख रुपये मुआवजे की मांग करने वाली याचिका को खारिज कर दिया है। मुख्य न्यायाधीश रमेश सिन्हा और न्यायमूर्ति रविंद्र कुमार अग्रवाल की खंडपीठ ने कहा कि याचिकाकर्ता यह साबित करने में असफल रहा कि उसकी हिरासत कानून के विरुद्ध या दुर्भावनापूर्ण तरीके से की गई थी। ऐसे में मुआवजा देने का कोई आधार नहीं बनता।
मामला सरगुजा जिले के बतौली निवासी जामुना प्रसाद गुप्ता से जुड़ा है। याचिकाकर्ता का कहना था कि वर्ष 2021 में उन्हें तीन दिनों तक अवैध रूप से हिरासत में रखा गया, जिससे उन्हें मानसिक और शारीरिक पीड़ा के साथ सामाजिक प्रतिष्ठा को भी नुकसान पहुंचा। इसी आधार पर उन्होंने राज्य से पांच लाख रुपये मुआवजे की मांग की थी।
रिकॉर्ड के अनुसार, 22 सितंबर 2021 को पुलिस ने जामुना प्रसाद गुप्ता को दंड प्रक्रिया संहिता (तत्कालीन CrPC) की धारा 151, 107 और 116 के तहत कार्यपालिक दंडाधिकारी के समक्ष पेश किया था। उसी दिन जमानत बांड प्रस्तुत किए जाने के बावजूद उनकी रिहाई 24 सितंबर को बांड स्वीकार होने के बाद हुई।
याचिकाकर्ता ने पहले जिला न्यायालय का दरवाजा खटखटाया था, लेकिन 28 फरवरी 2025 को उनकी याचिका खारिज कर दी गई। इसके बाद उन्होंने हाई कोर्ट में राहत की मांग की।
मामले की सुनवाई के दौरान हाई कोर्ट ने कहा कि याचिकाकर्ता यह साबित नहीं कर सका कि पुलिस की कार्रवाई दुर्भावना से प्रेरित थी या हिरासत पूरी तरह अवैध थी। पैसे मांगने जैसे आरोपों के समर्थन में भी कोई विश्वसनीय साक्ष्य प्रस्तुत नहीं किया गया।
खंडपीठ ने अपने फैसले में स्पष्ट किया कि केवल आरोप लगाने से मुआवजा नहीं दिया जा सकता। जब तक मौलिक अधिकारों के वास्तविक उल्लंघन और अवैध हिरासत के ठोस प्रमाण उपलब्ध न हों, तब तक क्षतिपूर्ति का दावा स्वीकार नहीं किया जा सकता। इन्हीं टिप्पणियों के साथ हाई कोर्ट ने पांच लाख रुपये मुआवजे की मांग वाली याचिका को खारिज कर दिया।

