आत्म उत्क्रांति आध्यात्मिक चाचातुर्मास-2026…. मनुष्य जीवन अमूल्य है, इसे आत्मकल्याण के लिए सार्थक बनाएं : साध्वी मंजुलाश्रीजी

आत्म उत्क्रांति आध्यात्मिक चाचातुर्मास-2026…. मनुष्य जीवन अमूल्य है, इसे आत्मकल्याण के लिए सार्थक बनाएं : साध्वी मंजुलाश्रीजी

रायपुर(अमर छत्तीसगढ़) 4 अगस्त । आत्म उत्क्रांति आध्यात्मिक चातुर्मास-2026 के अंतर्गत श्री जिनकुशलसूरि जैन दादाबाड़ी में आयोजित प्रवचन में पूज्य साध्वी मंजुलाश्रीजी महाराज साहिबा ने अध्यात्म सार ग्रंथ का पाठ करते हुए कहा कि जीवन महंगा है या सस्ता, यह इस बात पर निर्भर करता है कि हम उसकी कितनी कीमत समझते हैं। जिस वस्तु का मूल्य अधिक होता है, उसकी उपयोगिता भी उतनी ही अधिक होती है। मनुष्य शरीर अत्यंत दुर्लभ और अमूल्य है। देवता भी इस जन्म की कामना करते हैं, क्योंकि मोक्ष प्राप्ति का अवसर केवल मनुष्य जीवन में ही मिलता है।

उन्होंने कहा कि मनुष्य को इंद्रियों का स्वामी बनना चाहिए, लेकिन आज अधिकांश लोग इंद्रियों के वश में होकर जीवन व्यतीत कर रहे हैं। मनुष्य के पास विवेक और आत्मकल्याण का मार्ग चुनने की क्षमता है, फिर भी वह क्षणिक सुखों में उलझकर अपने जीवन के वास्तविक उद्देश्य से दूर हो जाता है।

साध्वीश्री ने एक प्रेरक प्रसंग सुनाते हुए बताया कि एक संत निर्जन वन में साधना कर रहे थे। वहां एक युवक पहुंचा और उनसे पूछा कि इतने वीरान स्थान पर वे क्या कर रहे हैं। संत ने उत्तर दिया, “मेरे पास समय बहुत कम है और काम बहुत अधिक। मुझे यहां दो बाज, दो गरुड़, एक सर्प, दो खरगोश और एक गधे को प्रशिक्षित करना है।”

युवक ने चारों ओर देखा, लेकिन वहां कोई पशु-पक्षी दिखाई नहीं दिए। तब संत ने समझाया कि दो बाज हमारी आंखें हैं, दो गरुड़ हमारे हाथ हैं, सर्प हमारी जिह्वा है, दो खरगोश हमारे दोनों पैर हैं और गधा हमारा शरीर है। इन सभी को संयम और अनुशासन में रखना ही सच्ची साधना है।

उन्होंने कहा कि जो व्यक्ति अपनी इंद्रियों पर नियंत्रण स्थापित कर लेता है, वही आत्मविकास और मोक्ष मार्ग की ओर अग्रसर होता है। मनुष्य जीवन का वास्तविक मूल्य तभी है, जब उसका उपयोग धर्म, संयम और आत्मचिंतन में किया जाए।

प्रवचन के अंत में साध्वी मंजुलाश्रीजी ने श्रद्धालुओं से आत्मसंयम, सदाचार और पुरुषार्थपूर्ण जीवन अपनाने का आह्वान करते हुए कहा कि मनुष्य जन्म को व्यर्थ न गंवाएं, बल्कि इसे आत्मकल्याण का माध्यम बनाएं।

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