राजनांदगांव (अमर छत्तीसगढ़) 7 अगस्त। जैन मुनि श्री समयप्रभ सागर जी ने कहा कि आप चाहे जितना भी जीवों को सता लें , कपट कर लें और विभिन्न तरीकों से पाप कर सारे भोग विलासिता के समान जुटा लें किंतु आप यह न सोचे कि आपके पापों का भागीदार कोई और होगा। उन्होंने कहा कि भले ही परिवार के लोग आपके द्वारा एकत्र भौतिक सुख सुविधाओं का उपयोग कर ले किन्तु कोई भी आपके पाप का हिस्सा नहीं बनेगा।
मुनि श्री समयप्रभ सागर जी ने आज अपने चातुर्मासिक प्रवचन में कहा कि जो खुद का पेट भरने के साथ-साथ परिवार का एवं जीवों का भी पेट भरता हो,वह ही सही मायने में पालक होता है। अपनी रक्षा के साथ-साथ दूसरों के जीवन की रक्षा भी हमारा दायित्व है। उन्होंने कहा कि अनीति के रास्ते में साधक जरूर बढ़ते हैं किंतु वह आपको चोट ही पहुंचाएंगे, बल्कि अपने पाप को ढकने का काम करेंगे। अनीति के रास्ते में दुर्गति मिलती है जबकि नीति के रास्ते में सद्गति मिलती है, संतोष प्राप्त होता है और किसी प्रकार की बेचैनी का सामना नहीं करना पड़ता।
मुनि श्री ने कहा कि व्यक्ति संसार से दुखी नहीं होता बल्कि संसार के दुखों से दुखी होता है। कोई भी पीड़ा को बाँट नहीं सकता। व्यक्ति आपके दुख से दुखी हो सकता है किंतु दुख को बांटने का काम वह नहीं कर सकता। दुख को यदि बांटना है तो आपको परमात्मा के नियमों के पालन करने की शपथ लेनी होगी। उन्होंने कहा कि शपथ (पचकान )की अपनी महिमा है। शपथ लेने से विश्वसनीयता बढ़ती है। सामान्य सा पचकान हमें भरोसेमंद बना देता है। हमें भी कम से कम एक पचकान तो लेना ही चाहिए कि हम जानबूझकर किसी भी जीव की हत्या नहीं करेंगे। यह जानकारी मीडिया प्रभारी विमल हाजरा ने दी।

