राजनांदगाव(अमर छत्तीसगढ़) 18अगस्त। परम पूज्य खरतरगच्छाधिपति आचार्य श्री जिनमणिप्रभसूरीश्वरजी म.सा. ,खरतर गच्छाधिपति मणिप्रभ सागर जी के सुशिष्य समयप्रभ सागर जी ने आज यहां कहा कि विपरीत परिस्थितियों में भी सकारात्मक सोच रखना चाहिए। व्यक्ति को नकारात्मक सोच जल्दी आती है।जबकि सकारात्मक सोच से ही हम अपने ध्येय ( मोक्ष ) की ओर बढ़ सकते हैं।
मुनि श्री आज ज्ञानवल्लभ उपाश्रय भवन में नियमित प्रवचन में फरमा रहे थे। उन्होंने कहा कि एक बार वैराग्य की भावना पाल लो तो आपमें जागृति आ जाएगी। आपके कर्मों की निर्जला हो जाएगी। हम अनुमोदना सच्चे मन से करना सीख जाए तब कहीं जाकर हमें अनुभूति होगी और हम लक्ष्य की ओर बढ़ पाएंगे।
श्रेयांशप्रभ सागर
इससे बाद जैन मुनि श्री श्रेयांशप्रभ सागर ने धर्म सभा को संबोधित किया उन्होंने कहा कि जो हमारे जीवन में जरुरी है, उसे हमें कभी नहीं छोड़ना चाहिए। यही प्रेम है। उन्होंने कहा कि कोई एक कनेक्शन होता है जो पता नहीं कहां से आता है और सामने वाले से मिल जाता है, यही प्रेम होता है। किसी से प्रेम हो गया तो फिर उसे छोड़ा नहीं जाता। प्रेम वह होता है जो सामने वाले के छोड़ देने के बाद भी आप उसे नहीं छोड़ पाते। आप सोचते हैं कि वह मेरे पास नहीं तो क्या हुआ मैं तो उसके पास हो सकता हूं। यदि यह विचार आपके मन में ना आए तो फिर प्रेम कैसा?
मुनि श्री श्रेयांशप्रभ जी ने कहा कि समय के अनुसार सब बदल जाता है किंतु प्रेम नहीं बदलता। उन्होंने कहा कि व्यक्ति को नकारात्मक सोच जल्दी आती है। वह इसी सोच के चलते तथ्य का सही अनुभव नहीं कर पाता। तथ्यों की सही जांच नहीं कर पाता। उन्होंने कहा कि जिन्होंने मुझे अनुभव दिया, जिन्होंने मुझे संस्कार दिया और जिन्होंने मुझे जन्म दिया,उन्हें कभी नहीं भूलना चाहिए। हम मकान बनाते समय पहले अपने कमरे के बारे में सोचते हैं जबकि हमें पहले मंदिर या पूजा कक्ष के निर्माण के बारे में सोचना चाहिए। हमें परमात्मा को नहीं भूलना चाहिए। यह जानकारी मीडिया प्रभारी विमल हाजरा ने दी।

