आत्म उत्क्रांति आध्यात्मिक चातुर्मास-2026.. आत्मा को समझकर संयम, समर्पण और प्रेम के रास्ते पर चलें, तभी जीवन बनेगा सार्थक : साध्वी मंजुलाश्रीजी

आत्म उत्क्रांति आध्यात्मिक चातुर्मास-2026.. आत्मा को समझकर संयम, समर्पण और प्रेम के रास्ते पर चलें, तभी जीवन बनेगा सार्थक : साध्वी मंजुलाश्रीजी

रायपुर(अमर छत्तीसगढ़) 22 अगस्त । आत्म उत्क्रांति आध्यात्मिक चातुर्मास-2026 के अंतर्गत दादाबाड़ी में अध्यात्म सार ग्रंथ का पठन करते हुए शनिवार को साध्वी मंजुलाश्रीजी म.सा. ने जीवन से जुड़े विभिन्न पहलुओं पर विस्तार से मार्गदर्शन दिया। उन्होंने कहा कि मनुष्य को यह समझना होगा कि उसका जीवन किस उद्देश्य के लिए मिला है। केवल संसार की योजनाएं बनाने के बजाय आत्मकल्याण और मोक्ष की दिशा में भी चिंतन जरूरी है।

साध्वीश्री ने कहा कि हमें आत्मा को भूलकर नहीं जीना चाहिए और संसार की उलझनों में इतना नहीं फंसना चाहिए कि अपने वास्तविक स्वरूप को ही भूल जाएं। स्वयं को समझना मोक्ष प्राप्ति की दिशा में पहला कदम है। व्यक्ति दिनभर चिंतन करता है, लेकिन जिस विषय पर वास्तव में चिंतन करना चाहिए, उस पर ध्यान नहीं देता। व्यर्थ के चिंतन से मन अशांत होता है, जबकि अध्यात्म में रमने से जीवन में व्यापकता आती है।

उन्होंने कहा कि जीवन अनमोल है और समय किसी के लिए रुकता नहीं है। पलक झपकने जितने समय को भी व्यर्थ नहीं गंवाना चाहिए। समय का श्रेष्ठ उपयोग प्रभु भक्ति, साधना और आत्मचिंतन में होना चाहिए। उन्होंने समझाया कि मनुष्य को भविष्य की प्लानिंग के साथ वर्तमान में संयम और विवेक की भी योजना बनानी चाहिए।

साध्वीश्री ने समर्पण के महत्व पर कहा कि साधना में समर्पण नहीं होगा तो भीतर वह व्याकुलता पैदा नहीं होगी, जो आत्मकल्याण के लिए जरूरी है। समर्पण के लिए अहंकार को छोड़ना पड़ता है। समर्पण और कषाय एक साथ नहीं चल सकते। जब अहंकार, राग और द्वेष कम होंगे, तभी साधना सही दिशा में आगे बढ़ेगी।

उन्होंने कहा कि जीवन में संयम और अनुशासन बेहद जरूरी है। व्यक्ति को अपनी इंद्रियों और इच्छाओं पर नियंत्रण रखना सीखना होगा। विषयों के प्रति अधिक आसक्ति और मूर्छा विवेक को कमजोर कर देती है। राजा के आम वाले प्रसंग के माध्यम से उन्होंने समझाया कि संयम टूटने की कीमत कभी-कभी बहुत बड़ी चुकानी पड़ती है।

साध्वीश्री ने कहा कि अपनी योग्यता बढ़ाने से उदारता और अच्छे गुणों का विकास होता है। दूसरों के व्यवहार का अवलोकन करते हुए हमें अपने भीतर सुधार करना चाहिए। कोई तिरस्कार करे तो उसे कड़वे घूंट की तरह सहन करने की क्षमता विकसित करनी चाहिए। भूल हो जाए तो उसे तुरंत स्वीकार करना चाहिए और इसके लिए ‘मिच्छामी दुक्कड़म’ जैसे भाव को जीवन में उतारना चाहिए।

परिवार को लेकर उन्होंने कहा कि आज सबसे बड़ी चिंता यह है कि बच्चों के साथ भविष्य में बुढ़ापा कैसा बीतेगा। संतान सबसे बड़ी संपत्ति भी बन सकती है और सबसे बड़ी विपत्ति भी। बच्चों को माता-पिता के बुढ़ापे में सहारे की लाठी बनना चाहिए, न कि उन्हें लाठी चलाने की स्थिति में पहुंचाना चाहिए। उन्होंने कहा कि सास-बहू के बीच प्रेम और समझ बन जाए तो पूरे परिवार का कल्याण हो सकता है। परिवार को हमेशा पैसे की नहीं, आपसी प्रेम, सम्मान, विश्वास और चिंतन की जरूरत होती है।

साध्वीश्री ने कहा कि हमें अपना लक्ष्य निर्धारित करना चाहिए। यदि लक्ष्य मोक्ष है तो संसार के प्रति मोह, राग और द्वेष का त्याग करना होगा। सम्यक दर्शन की प्राप्ति से संसार छोटा लगने लगता है और जीवन में मैत्री भाव का उदय होता है। व्यक्ति को यह भावना रखनी चाहिए कि भले ही उसकी अपेक्षाएं पूरी हों या न हों, लेकिन उसके माध्यम से दूसरों की अपेक्षाएं पूरी हों।

उन्होंने कहा कि जीवन को कीमती बनाना हमारे अपने हाथ में है। अपनी ताकत और योग्यता को सही समय पर पहचानना जरूरी है। अवसर मिलने पर काम को टालना नहीं चाहिए, क्योंकि ‘अभी बहुत समय है’ की सोच ही कई बार जीवन की सबसे बड़ी भूल बन जाती है। चिंतन, संयम, समर्पण, मैत्री, कृतज्ञता और आत्मअनुशासन को जीवन में उतारकर ही मनुष्य अपने जीवन को सही दिशा दे सकता है।

इस अवसर पर श्री ऋषभदेव मंदिर ट्रस्ट के अध्यक्ष विजय कांकरिया, कार्यकारी अध्यक्ष अभय कुमार भंसाली, ट्रस्टी नरेश बैदमुथा, राजेंद्र गोलछा एवं उज्ज्वल झाबक तथा आत्म उत्क्रांति आध्यात्मिक चातुर्मास-2026 समिति के अध्यक्ष बसंत लोढ़ा, महासचिव मुकेश निमाणी, सह-सचिव अभिषेक गोलछा एवं कोषाध्यक्ष चिंतन मालू सहित बड़ी संख्या में श्रद्धालु उपस्थित रहे।

Chhattisgarh