धर्म को केवल क्रियाओं तक सीमित नहीं, जीवन में उतारना जरूरी : साध्वी मंजुलाश्रीजी

धर्म को केवल क्रियाओं तक सीमित नहीं, जीवन में उतारना जरूरी : साध्वी मंजुलाश्रीजी

रायपुर(अमर छत्तीसगढ़) 26 अगस्त । आत्म उत्क्रांति आध्यात्मिक चातुर्मास-2026 के अंतर्गत दादाबाड़ी में अध्यात्म सार ग्रंथ का पठन करते हुए बुधवार को साध्वी मंजुलाश्रीजी म.सा. ने कहा कि धर्म को सुरक्षित रखना है और उसमें स्थिर हो जाना है। धर्म केवल पूजा, मंदिर जाने या धार्मिक क्रियाएं करने तक सीमित नहीं है, बल्कि आत्मा को कषायों से बचाकर शुद्धता की ओर ले जाना ही धर्म का वास्तविक उद्देश्य है।

साध्वीश्री ने कहा कि धर्म में स्थिर होने का अर्थ है कि परिस्थितियां कैसी भी हों, हमारे भीतर सम्यक दर्शन, सम्यक ज्ञान और सम्यक चरित्र की भावना कमजोर नहीं होनी चाहिए। धर्म की पहली सुरक्षा हमारे अपने भावों से होती है। मन में क्रोध, अहंकार और द्वेष रखकर बाहर से कितनी भी धार्मिक क्रियाएं कर लें, आत्मा के परिणाम शुद्ध नहीं हो सकते।

उन्होंने कहा कि मंदिर जाना, जिनवाणी सुनना, सामायिक, प्रतिक्रमण, पूजा और तप तभी सार्थक हैं, जब उनका प्रभाव हमारे व्यवहार में दिखाई दे। पूजा के बाद भी छोटी-सी बात पर क्रोध आ जाए या किसी के प्रति कटुता पैदा हो जाए तो हमें स्वयं से पूछना चाहिए कि धर्म हमारे भीतर कितना आया है।

साध्वीश्री ने अनेकान्तवाद का उल्लेख करते हुए कहा कि हर व्यक्ति अपनी दृष्टि और अनुभव के अनुसार संसार को देखता है। इसलिए दूसरे के विचार को तुरंत गलत मानने के बजाय उसके दृष्टिकोण को समझने की विनम्रता होनी चाहिए। अपनी मान्यता पर दृढ़ रहते हुए भी दूसरे के विचारों का सम्मान करना चाहिए। इससे मतभेद मनभेद में नहीं बदलेंगे।

उन्होंने कहा कि धर्म में स्थिरता की असली परीक्षा सुख में नहीं, बल्कि विपरीत परिस्थितियों में होती है। कोई अपमान करे, विरोध करे या हमारी बात न माने, तब भी यदि हम क्षमा, संयम और समता बनाए रखते हैं तो समझना चाहिए कि धर्म हमारे भीतर उतर रहा है।

साध्वीश्री ने कहा कि दूसरों के दोष देखने से पहले अपने परिणामों को देखना चाहिए। आज किस बात पर क्रोध आया, किसके प्रति द्वेष पैदा हुआ और कहां अहंकार आया, इस पर आत्मचिंतन जरूरी है। धर्म को केवल मंदिर की चौखट तक नहीं रखना है, बल्कि वाणी में अहिंसा, व्यवहार में करुणा और जीवन में संयम दिखाई देना चाहिए।

उन्होंने कहा कि दूसरों से जीतना धर्म नहीं, अपने क्रोध पर जीतना धर्म है। दूसरों को बदलना धर्म नहीं, अपने परिणामों को बदलना धर्म है। जब दुख देने वाले के प्रति भी क्षमा का भाव रहे और विपरीत परिस्थितियों में भी समता बनी रहे, तभी धर्म को जानने के साथ उसमें स्थिर होने की शुरुआत होती है।

इस अवसर पर श्री ऋषभदेव मंदिर ट्रस्ट के अध्यक्ष विजय कांकरिया, कार्यकारी अध्यक्ष अभय कुमार भंसाली, ट्रस्टी नरेश बैदसमुघा, राजेंद्र गोलछा एवं उज्ज्वल झाबक तथा आत्म उत्क्रांति आध्यात्मिक चातुर्मास-2026 समिति के अध्यक्ष बसंत लोढ़ा, महासचिव मुकेश निमाणी, सह-सचिव अभिषेक गोलछा एवं कोषाध्यक्ष चिंतन मालू सहित बड़ी संख्या में श्रद्धालु उपस्थित रहे।

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