ब्यावर राजस्थान (अमर छत्तीसगढ़) 30 अगस्त।
आचार्य श्री रामेश के शिष्य ब्यावर रत्न शासन दीपक श्री विनय मुनि जी म.सा.ने आज सुबह खचाखच भरे समता भवन के प्रवचन हाल मे जितनी दौलत उतनी मुसीबत पर अपनी अमृत देशना फरमाते हुए भजन से कहा जब हो गुरु देव के दर्शन समझो तीर्थ हो गया।
हमें वीतराग देव प्रभु महावीर का इस जीवन पर अनन्त उपकार रहा इस संसार में समस्त प्राणियों को मंगल देशना उपदेश दिया उस वीतराग वाणी को सुनकर अनेक राजा महाराजा अपने जीवन को स्वस्थ संस्कार बना लिया जो शास्वत सुख आध्यात्मिकता की और देने वाला बन गया।
म सा ने आज का विषय पर बताया जितनी दौलत उतनी मुसीबत होती है क्योंकि दोलत और मुसीबत रेल के पटरी की तरह साथ साथ चलती है न अलग रहती है, ज्यादा दौलत उतना व्यक्ति मोहताज उतनी अधिक मुसीबत हम दौलत के गुलाम बनते जा रहे हैं, दौलत के चक्रव्यूह में फंसता जा रहा है,धन कमाने के लिए चक्रवती ब्याज में लगा रहता है जो चौबीस घंटे चलता इसी प्रकार तिजोरी में धन का अंबार होने से व्यक्ति उसकी सुरक्षा के खातिर घर में विदेशी फल फ्रूट होने के बाबजूद खाना पीना रहना सोना सब कुछ भुलता जा रहा है समस्या खत्म होने का नाम नहीं लेता।
म सा ने आगे बताया असली दौलत का खजाना आध्यात्मिकता का है। जिस व्यक्ति को सत्य का बौध हो गया उसके लिए धन संपदा किसी काम की नहीं वह सब कुछ छोडकर शांति में जी पायेगा जैसे चौबीस तीर्थंकर ने सारी धन संपदा वैभव छोड़कर शांति पाने के लिए सब कुछ त्याग कर दिया,और हम आज उसी दौलत के पीछे गुलाम बनते जा रहे हैं,और तरह तरह की परेशानी से गिरते जा रहे हैं।जो जितना ज्यादा पैसा कमाता वो उतना खाना कम खाता,पैसे की चिंता जो रहती,इस कारण शरीर बिमारी का साम्राज्य बन गया।
म सा ने कहा व्यक्ति को धन दौलत को महत्व नहीं देवे और न 99 के चक्कर में 100 पूरा करने मे फंसे, आत्मा की आवाज सुने सदा गुलाब के फूल की तरह मुस्कुराते रहे हैं।
जो व्यक्ति निती से कमाता रिती से खर्च करता है वह किर्ती से दान देता है,वह व्यक्ति देव गुरु धर्म पर विश्वास करता है और दौलत का सदुपयोग करता है अनर्थ दंड में नहीं जाता क्या गरिबी क्या अमिरी सबका अपना अपना नसीब होता है,बुद्धिमान व्यक्ति दौलत को पीठ दिखाता व सत्य को समझता हैं।
इससे पहले श्री दिव्य दर्शन जी म सा ने कहा हमें साधु संतों को स्वीकार करके उनकी जिनवाणी पर श्रद्धा रखें, आत्मा में लगकर श्रावक धर्म से अणगार धर्म को स्वीकार करें।मन को समझाना विषय लाभप्रद नहीं हो,हम भोगों के पीछे लालसी बनते जा रहे हैं जिस कारण अनंत क्षेत्र में अनंत बार जन्म लेते जा रहे हैं, भगवान के स्वरूप को जानना यह शरीर अलग है आत्मा अलग है।
म सा ने कहा जितनी मर्यादा उतनी निवृत्ति की और आना, आनंद श्रावक ने धन की मर्यादा रखी उसके आगे वह नहीं गया।अपने स्वभाव को समभाव बनावें।पैसा कमाना गलत नहीं उसका उपयोग भोग कैसा होना चाहिए।आचरण से साधु साध्वी की पहचान होती है। भगवान महावीर की वाणी के आगे संसार का रस फीका लगता हैं।
महाबली श्री पराग श्रीजी म सा ने कहा जहां से चालू होते हैं वहीं से समाप्त होता है, किस्मत खराब होगी तो सभी काम उल्टा हो जायेगा। आज व्यक्ति का मैं हृदय में रहता है, ईष्र्या नागिन के समान बनती जा रही हैं।
आज की धर्म सभा में डोंगर गांव से वीर चौपड़ा परिवार इन्दोरी, मंदसौर व वर्धमान जैन संघ सांकेत नगर ब्यावर के सदस्य उपस्थित रहें।
संघ प्रवक्ता
नोरत मल बाबेल
साधुमार्गी जैन संघ,ब्यावर।

