प्रभु की कृपा बरसे तो मिट जाता है कर्ज का बोझ, लौट आती है जीवन में खुशियां : मुनि सर्वार्थ रत्न सागर

प्रभु की कृपा बरसे तो मिट जाता है कर्ज का बोझ, लौट आती है जीवन में खुशियां : मुनि सर्वार्थ रत्न सागर

रायपुर(अमर छत्तीसगढ़) 8 सितंबर । पर्युषण महापर्व के प्रथम दिन नवकार नगर स्थित श्री मुनि सुब्रत स्वामी जिनालय में धर्म और भक्ति का अद्भुत वातावरण देखने को मिला। इस पावन अवसर पर मुनि सर्वार्थ रत्न सागर जी म.सा. ने श्रद्धालुओं को अपने प्रवचन के माध्यम से धर्म, श्रद्धा, विश्वास और प्रभु कृपा का महत्व समझाया। जिनालय में उपस्थित श्रद्धालु पूरे मनोयोग से उनके प्रवचन को सुनते रहे।

मुनि श्री ने कहा कि पर्युषण महापर्व केवल धार्मिक अनुष्ठानों का पर्व नहीं है, बल्कि यह आत्मचिंतन, संयम, क्षमा और अपने भीतर झांकने का अवसर है। जब मनुष्य सच्ची श्रद्धा के साथ प्रभु की शरण में जाता है, तो उसके जीवन में सकारात्मक परिवर्तन का मार्ग खुलता है। आवश्यकता केवल इतनी है कि हमारा विश्वास अटूट हो और भावनाओं में सच्चाई हो।

प्रवचन के दौरान मुनि श्री ने एक प्रेरणादायी प्रसंग सुनाते हुए कहा कि एक लड़की अपने पारिवारिक रिश्तेदार के घर आई हुई थी। उसे अनंतपुर के बारे में विशेष जानकारी नहीं थी, लेकिन उसके जीवन में यह एक ऐसा अवसर बन गया, जिसे वह कभी भूल नहीं सकी। वह अपनी फूफी के साथ श्री प्रभु के दर्शन के लिए गई।

मुनि श्री ने प्रसंग को आगे बढ़ाते हुए बताया कि परिवार उस समय आर्थिक और मानसिक परेशानियों से गुजर रहा था। घर की परिस्थितियां ऐसी थीं कि पिता के पास देने के लिए कुछ भी नहीं था। परिवार पर उधार और कर्ज का बोझ था और उन्हें लग रहा था कि वे खाली हाथ ही लौटने के लिए मजबूर होंगे। निराशा के इसी दौर में श्री गुरु महाराज का उस घर में प्रवेश हुआ।

परिवार की परिस्थिति देखकर पिता ने अपनी विवशता व्यक्त करते हुए कहा कि सब कुछ उधार और कर्ज पर चल रहा है। हमारे पास ऐसा कुछ नहीं है जिसे हम भेंट या सेवा के रूप में दे सकें। लेकिन प्रभु की कृपा कब और किस रूप में बरस जाए, यह कोई नहीं जानता।

इसके बाद जो हुआ, वह परिवार के लिए किसी चमत्कार से कम नहीं था। देखते ही देखते उधार और कर्ज से जुड़े सभी हिसाब जैसे समाप्त हो गए। जिन कागजों के पन्नों पर उधारी का विवरण दर्ज था, उनमें एक भी उधार बाकी नहीं बचा। परिवार के लिए यह क्षण आश्चर्य, श्रद्धा और भाव-विभोर कर देने वाला था।

मुनि सर्वार्थ रत्न सागर जी म.सा. ने कहा कि जब मनुष्य के जीवन में विश्वास का दीपक जलता है, तब निराशा का अंधकार धीरे-धीरे दूर होने लगता है। श्री प्रभु ने उस घर को कृतार्थ किया और परिवार के भीतर एक नई ऊर्जा का संचार हुआ। विचारों का तूफान आया, लेकिन उसी के साथ विश्वास और भक्ति ने चमत्कार का अनुभव करा दिया।

इस घटना के बाद परिवार के पिता ने अपने सभी कर्मचारियों को प्रसन्नचित्त होकर काम शुरू करने के लिए प्रेरित किया। निराशा की जगह उत्साह ने ले ली और चिंता की जगह विश्वास ने जन्म लिया। मुनि श्री ने श्रद्धालुओं को संदेश दिया कि जीवन में परिस्थितियां कितनी भी कठिन क्यों न हों, सच्ची श्रद्धा, सकारात्मक विचार और प्रभु के प्रति अटूट विश्वास मनुष्य को भीतर से मजबूत बनाते हैं।

उन्होंने कहा कि पर्युषण का वास्तविक संदेश भी यही है कि हम अपने भीतर के विकारों, अहंकार, क्रोध और नकारात्मकता को दूर करें तथा क्षमा, संयम, करुणा और आत्मशुद्धि के मार्ग पर आगे बढ़ें। प्रभु के प्रति हमारा भाव केवल मांगने का नहीं, बल्कि स्वयं को बदलने का होना चाहिए।

प्रवचन के अंत में मुनि श्री ने कहा कि श्री प्रभु अब अनंतधाम की ओर प्रस्थान करेंगे, लेकिन उनके द्वारा दिया गया धर्म और श्रद्धा का संदेश सदैव श्रद्धालुओं के हृदय में जीवित रहेगा। उन्होंने सभी से पर्युषण महापर्व को आत्मशुद्धि, संयम और प्रभु भक्ति के साथ मनाने का आह्वान किया।

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