राजनांदगांव(अमर छत्तीसगढ़) 8 सितम्बर। ” अगर सामने मौत आ जाती है तो अच्छे-अच्छों के विचार बदल जाते हैं। यदि इस समय भी मन में भक्ति का भाव हो तो जीवन धन्य हो जाए। उन्होंने कहा कि बिरले ही होते हैं जो ऐसी स्थिति में भी भक्ति के भाव में डूबे रहते हैं।
” उक्त उदगार खरतर गच्छाधिपति मणिप्रभ सागर जी के सुशिष्य श्रेयांशप्रभ सागर जी ने आज जैन बगीचा स्थित नये हाल में संवत्सरी पर्व के पहले दिन अपने नियमित प्रवचन में व्यक्त किए।
मुनि श्रेयांशप्रभ सागर ज़ी ने कहा कि मन में हमेशा जीव दया का भाव होना चाहिए। केवल एक अभयदान से परिस्थितियां बदल जाती है।
उन्होंने कहा कि हमारे भाव कितने भी अच्छे हो किंतु सामने में जब मौत आती है तब अच्छे – अच्छों के विचार बदल जाते हैं। ऐसी परिस्थिति में भी जब मन में भक्ति का भाव हो तो जीवन धन्य हो जाता है। इस दौरान यदि अभयदान मिल जाए तो जीवन का रूप ही बदल जाता है।
मुनि श्री ने कहा कि जिस तरह जिज्ञासा मानवों में होती है, उसी तरह पशुओं में भी जिज्ञासा होती है। उन्होंने कहा कि जिज्ञासा का समाधान एकांत में विचार करने से हो जाता है। विचारों की दिशा यदि नहीं बदल पाए तो पश्चाताप होता है। विचारों पर नियंत्रण एवं दिशा बदलना सीखो।
उन्होंने कहा कि संवत्सरी पर्व आराधना का पर्व है और इस पर्व के दौरान हम जितनी आराधना करते हैं उतना ही लाभ हमें मिलता है और हम अपने लक्ष्य की ओर अग्रसर होते हैं। यह जानकारी मीडिया प्रभारी विमल हाजरा ने दी।

