राजनांदगांव(अमर छत्तीसगढ़) 9 सितम्बर। ” क्षमा मांगना एवं क्षमा देना, दोनों ही महान कार्य हैं। इससे मन का बोझ हल्का हो जाता है और एक शांति मिलती है।” उक्त उदगार खरतर गच्छाधिपति मणिप्रभ सागर जी के सुशिष्य श्रेयांशप्रभ सागर जी ने आज जैन बगीचा स्थित नये हाल में संवत्सरी पर्व के दूसरे दिन अपने नियमित प्रवचन में व्यक्त किए।
मुनि श्री ने कहा कि यदि कोई कष्ट में है तो उसकी मदद करें और उसका सपोर्ट करें। उन्होंने कहा कि जरूरी नहीं है कि पैसे से ही सपोर्ट हो, सपोर्ट कई तरीके से दे सकते हैं। उन्होंने कहा कि हमें गलतियों को दोहराना नहीं चाहिए। हम इंसान हैं और इंसानों से गलतियां तो होती ही रहती है लेकिन हमें यह ध्यान रखना चाहिए कि गलतियों की पुनरावृत्ति ना हो। इसके अलावा गलतियों के लिए क्षमा मांगना और क्षमा देना भी सीखें।
मुनि श्रेयांशप्रभ जी ने कहा कि माफ करो तो दिल से करो। झूठे दिल से कभी माफ मत करो। इसी तरह माफी मांगो तो दिल से मांगो, झूठे दिल से कभी भी माफी मत मांगो। स्वतंत्रता दिवस या संवत्सरी जैसा कोई भी दिन जागरूकता को लाने के लिए आता है। स्वतंत्र तो हम पहले से ही हैं लेकिन स्वतंत्रता दिवस हमारी स्वतंत्रता के लिए दी गई कुर्बानियों की याद दिलाता है। ठीक इसी तरह संवत्सरी पर्व हमारे भीतर क्षमा भावना की जागरूकता लाने के लिए आता है। क्षमा तो हम कभी भी मांग सकते हैं और कहीं भी मांग सकते हैं लेकिन संवत्सरी के दिन हम खुले मन से बिना किसी हिचक के एक – दूसरे से क्षमा मांगते हैं और क्षमा देते हैं। क्षमा मांगने या क्षमा देने से कोई ऊंचा- नीचा नहीं हो जाता। दोनों ही महान कार्य हैं।मुनिश्री ने कहा कि सामने वाले ने भले ही आपसे क्षमा नहीं मांगी फिर भी आप उसे क्षमा कर दें फिर देखिए आप कितना हल्का महसूस करेंगे। यह जानकारी मीडिया प्रभारी विमल हाजरा ने दी।

