सदर बाजार जैन मंदिर में 125 साल से निभाई जा रही आंगी की परंपरा, संवत्सरी पर सोने की आंगी में होंगे ऋषभदेव के दर्शन

सदर बाजार जैन मंदिर में 125 साल से निभाई जा रही आंगी की परंपरा, संवत्सरी पर सोने की आंगी में होंगे ऋषभदेव के दर्शन

रायपुर(अमर छत्तीसगढ़) 10 सितंबर । राजधानी के श्वेतांबर जैन मंदिरों में पर्युषण पर्व के दौरान आंगी रचना की परंपरा वर्षों से चली आ रही है। सदर बाजार स्थित श्री ऋषभदेव जैन मंदिर में यह परंपरा 125 साल से अधिक पुरानी है। आठ दिवसीय पर्युषण पर्व के दौरान प्रतिदिन अलग-अलग तरह की आंगी सजाई जा रही है। कीमती धातुओं, फूल, रुई, मौली और सितारों सहित विभिन्न सजावटी सामग्रियों से तैयार की जाने वाली यह आंगी श्रद्धालुओं के लिए आकर्षण का केंद्र बनी हुई है।

आंगी का संबंध तीर्थंकरों के दीक्षा से पहले के राजसी स्वरूप से जोड़ा जाता है। सांसारिक जीवन, राजपाट और वैभव छोड़कर संयम के मार्ग पर बढ़ने से पहले तीर्थंकरों के राजसी स्वरूप की स्मृति आंगी के माध्यम से कराई जाती है। आंगी का अर्थ ही प्रतिमा के अंगों की रचना और सजावट करना है। प्रतिमा के अलग-अलग अंगों के अनुरूप चांदी के कवच पहले से तैयार किए जाते हैं, जिन पर सजावटी सामग्री लगाकर आंगी का स्वरूप तैयार किया जाता है।

पर्युषण पर्व के दौरान 15 सितंबर को होने वाली संवत्सरी की आंगी विशेष आकर्षण का केंद्र रहेगी। इस दिन भगवान ऋषभदेव खरे सोने की आंगी में दर्शन देंगे। मंदिर से जुड़े श्रद्धालुओं के अनुसार इस तरह की सोने की आंगी के दर्शन वर्ष में केवल एक बार होते हैं।

40 साल पहले युवाओं ने संभाली परंपरा

करीब 40 वर्ष पहले तक मंदिर में आंगी बनाने की परंपरा मुख्य रूप से चार-पांच बुजुर्ग ही निभाते थे। इसके बाद युवकों के ग्रुप आंगी समिति ने इस परंपरा को आगे बढ़ाने के लिए प्रशिक्षण और प्रतियोगिताओं की शुरुआत की। धीरे-धीरे समाज के युवा, महिलाएं और युवतियां भी इससे जुड़ते गए और आंगी बनाने की कला का विस्तार हुआ।

समिति के प्रयासों से सैकड़ों युवतियों ने आंगी बनाना सीखा। विवाह के बाद जब वे दूसरे शहरों में गईं तो वहां के जैन मंदिरों में भी आंगी बनाने की परंपरा को आगे बढ़ाया। इस तरह वरिष्ठजनों से मिली कला और परंपरा नई पीढ़ी तक पहुंचती गई।

आंगी समिति के सदस्य राजमल संकलेचा, मांगीलाल गोलछा, प्रकाश लुंकड़, हरीश डागा, सुनील भंसाली, राजेश कानुंगा और गौतम लुनिया इस परंपरा को आगे बढ़ाने में सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं।

22 प्रतिमाओं की आंगी में लगते हैं चार से पांच घंटे

श्री ऋषभदेव जैन मंदिर में कुल 22 प्रतिमाएं प्रतिष्ठित हैं। इनमें श्री ऋषभदेव मूलनायक जी हैं। इसके अलावा श्री जिनकुशलसूरिजी सहित चारों दादागुरुदेव के पगलिये, शांति गुरुदेव और अन्य प्रतिमाएं प्रतिष्ठित हैं। पर्युषण पर्व और विशेष अवसरों पर इन प्रतिमाओं के लिए आकर्षक आंगी तैयार की जाती है।

एक आंगी तैयार करने में करीब चार से पांच घंटे लगते हैं। आंगी बनाने वाले श्रद्धालुओं को केवल पूजा के वस्त्र पहनकर ही यह सेवा करनी होती है। कई श्रद्धालु इस दौरान एकासना की आराधना भी करते हैं। आंगी बनाने की प्रक्रिया पूरी होने तक पानी पीना और बाहर जाना भी वर्जित रहता है। बाहर जाने पर दोबारा स्नान करना पड़ता है।

सुबह पूजा पूरी होने के बाद करीब 11:30 से 12 बजे के बीच प्रतिमाओं पर आंगी लगाई जाती है। इसके बाद प्रतिमा को छूना वर्जित माना जाता है।

चांदी के कवच पर तैयार होती है आंगी

आंगी प्रतिमा पर सीधे नहीं बनाई जाती। प्रतिमाओं के अंगों के अनुसार तैयार किए गए चांदी के कवच पर मैदा, लकड़ी का बुरादा यानी आंगी पाउडर या मोम का लेप किया जाता है। इसके बाद फूल, रुई, मौली, सितारे और अन्य सजावटी सामग्री लगाकर डिजाइन तैयार की जाती है। परंपरागत रूप से सोना, चांदी, हीरा, मोती, माणक और पन्ना जैसे बहुमूल्य रत्नों का भी इस्तेमाल किया जाता रहा है।

सजावट पूरी होने के बाद तैयार कवच को प्रतिमा पर लगाया जाता है। आंगी में इस्तेमाल होने वाली विभिन्न सामग्रियां मुख्य रूप से सूरत, अहमदाबाद, जयपुर, जोधपुर और मुंबई से मंगाई जाती हैं।

प्रशिक्षण से परंपरा को मिल रहा नया विस्तार

पिछले करीब 40 वर्षों से आंगी समिति द्वारा प्रशिक्षण दिया जा रहा है। प्रशिक्षण और प्रतियोगिताओं के माध्यम से युवाओं और महिलाओं को इस कला से जोड़ा गया। वरिष्ठजनों का उद्देश्य केवल स्वयं आंगी बनाना नहीं रहा, बल्कि आने वाली पीढ़ी को यह परंपरा और कला सौंपना भी रहा है।

इसी प्रयास का परिणाम है कि आज समाज के अनेक युवा और महिलाएं आकर्षक आंगी बनाने में दक्ष हो चुके हैं और यह परंपरा रायपुर से निकलकर दूसरे शहरों के जैन मंदिरों तक भी पहुंच रही है।

जैन धर्म के 11 कर्तव्यों में आंगी रचना को भी महत्वपूर्ण माना गया है। इसलिए पर्युषण के दिनों में की जाने वाली यह सेवा केवल प्रतिमा की सजावट नहीं, बल्कि श्रद्धा, कला, सेवा और परंपरा को अगली पीढ़ी तक पहुंचाने का माध्यम भी बन गई है।

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