जोधपुर राजस्थान (अमर छत्तीसगढ़) 11 सितंबर । पर्वाधिराज पर्युषण महापर्व के पावन अवसर पर श्री राज राजेश्वरी पार्श्व पद्मावती नवकार धाम में आध्यात्मिकता, भक्ति, साधना और सामाजिक समरसता का अद्भुत संगम देखने को मिला। पर्युषण महापर्व के चौथे दिन मुनिश्री लाभरूचि जी महाराज साहब एवं मुनिश्री मेधांश कुमार जी के सान्निध्य में विभिन्न धार्मिक एवं आध्यात्मिक आयोजन श्रद्धा और उत्साह के साथ संपन्न हुए।
स्नात्र पूजा में उमड़ी श्रद्धा दिन की शुरुआत पवित्र वातावरण में स्नात्र पूजा के साथ हुई। शीला जी जैन सहित अनेक श्रावक-श्राविकाओं ने श्रद्धापूर्वक पूजा का लाभ लिया। परमात्मा के प्रति समर्पित भावों के साथ हुए इस धार्मिक आयोजन से नवकार धाम का वातावरण भक्तिमय हो उठा।
स्नात्र पूजा केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि आत्मशुद्धि, विनय और परमात्मा के प्रति कृतज्ञता का भाव जगाने वाली साधना है। पर्युषण पर्व में ऐसे आयोजन मनुष्य को बाहरी आडंबर से हटाकर अपने भीतर झांकने की प्रेरणा देते हैं।
नवकार महामंत्र के जाप में दिखी अनूठी सामाजिक एकता
मध्यान्ह में नवकार धाम का वातावरण उस समय और भी विशेष बन गया, जब नार नाड़ी गांव के जैनेतर समाज के बालक-बालिकाओं, युवाओं, बुजुर्गों एवं ग्राम की बहनों के साथ जैन श्रावक समाज ने भी उत्साहपूर्वक सामूहिक जप अनुष्ठान में सहभागिता की।
नवकार महामंत्र के पावन जाप से पूरा परिसर आध्यात्मिक ऊर्जा से सराबोर हो गया। अलग-अलग सामाजिक पृष्ठभूमि से आए लोगों का एक साथ बैठकर मंत्र जाप करना पर्युषण पर्व के उस संदेश को जीवंत करता दिखाई दिया, जिसमें मैत्री, करुणा, क्षमा और सभी जीवों के प्रति मंगलभाव को सर्वोच्च स्थान दिया गया है।
यह दृश्य केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि यह संदेश भी था कि मंत्र की ध्वनि किसी एक समाज की सीमा में बंधी नहीं होती—सद्भाव और शांति का संदेश हर हृदय तक पहुंच सकता है।

धर्म के साथ सेवा और संस्कार की प्रभावना
नवकार धाम की ओर से सहभागी श्रद्धालुओं एवं ग्रामीणों को घरेलू उपयोगी वस्तुओं की प्रभावना भी प्रदान की गई। इस पहल ने धार्मिक आयोजन को सेवा और उपयोगिता से जोड़ते हुए एक अलग ही स्वरूप प्रदान किया।
पर्युषण महापर्व का वास्तविक उद्देश्य केवल पूजा-पाठ तक सीमित नहीं, बल्कि आत्मचिंतन, संयम, त्याग, सेवा, क्षमा और जीवन में सकारात्मक परिवर्तन लाना है। नवकार धाम में आयोजित कार्यक्रमों में इन मूल भावनाओं की सुंदर झलक देखने को मिल रही है।
पर्युषण बना आत्मा से संवाद का पर्व
मुनिश्री लाभरूचि जी महाराज साहब एवं मुनिश्री मेधांश कुमार जी के सान्निध्य में चल रहे पर्युषण महापर्व के आयोजनों में धर्म के साथ संस्कार और समाज के साथ सेवा को विशेष महत्व दिया जा रहा है।

पर्युषण हमें याद दिलाता है कि जीवन की सबसे बड़ी साधना बाहर कुछ पाने में नहीं, बल्कि अपने भीतर के क्रोध, मान, माया और लोभ को पहचानकर उन्हें कम करने में है। जब मन में मैत्री आती है, वाणी में मधुरता आती है और व्यवहार में करुणा आती है, तभी पर्युषण की साधना सार्थक होती है।
नवकार धाम में चौथे दिन का यह आयोजन इसी भावना का सजीव उदाहरण बना—जहां पूजा में श्रद्धा थी, जाप में एकाग्रता थी, सेवा में अपनापन था और पूरे आयोजन में सामाजिक समरसता की सुगंध थी।
एक परिसर, अनेक लोग और एक मंगलभाव
नवकार धाम का यह आयोजन इस बात को रेखांकित करता नजर आया कि धर्म का प्रभाव तभी व्यापक बनता है, जब वह समाज को जोड़ने, संस्कार देने और सेवा की प्रेरणा देने का माध्यम बने।
पर्युषण महापर्व के चौथे दिन नवकार महामंत्र की गूंज के बीच नार नाड़ी गांव से लेकर जैन समाज तक सभी की सहभागिता ने एक सुंदर संदेश दिया—
“जहां मन में मैत्री हो, वहां भेद मिट जाते हैं;
जहां नवकार की गूंज हो, वहां मंगलभाव जन्म लेते हैं।”
इसी मंगलभाव के साथ नवकार धाम में पर्युषण महापर्व के आगामी धार्मिक आयोजनों को लेकर भी श्रद्धालुओं में उत्साह बना हुआ।
नवकार धाम की तरफ से घरेलूं उपयोगी चीजों की प्रभावना वितरित की गई।

