रायपुर (अमर छत्तीसगढ़) 16 सितंबर ।
श्री दिगम्बर जैन बड़ा मंदिर में चल रहे समयोपदेश वर्षायोग 2026 के अंतर्गत पूज्य मुनि श्री आगम सागर जी महाराज ससंघ के पावन सानिध्य में दशलक्षण पर्यूषण महापर्व के प्रथम दिन अत्यंत भक्तिभाव एवं उत्साह के साथ उत्तम क्षमा दिवस मनाया गया।
प्रातः कालीन धार्मिक अनुष्ठान एवं श्रावक संस्कार शिविर
पर्व के प्रथम दिन प्रातः कालीन बेला में मुनि ससंघ के सानिध्य में श्रावक संस्कार शिविर का आयोजन हुआ। प्रातःकाल की शुरुआत 5.30 बजे प्रार्थना एवं ध्यान योग से हुई। इसके पश्चात प्रातः 6.30 बजे श्रीजी का अभिषेक एवं पूजन भक्तिभाव से किया गया। वर्षायोग समिति के अध्यक्ष श्री नरेंद्र जैन गुरुकृपा एवं कार्यकारी अध्यक्ष श्री संजय जैन नायक ने बताया कि प्रातः 8.15 बजे श्रद्धालुओं ने तत्त्वार्थ सूत्र की धार्मिक कक्षा के माध्यम से स्वाध्याय का पुण्य लाभ अर्जित किया। तत्पश्चात प्रातः 9 बजे मुनि श्री आगम सागर जी महाराज की मंगल देशना संपन्न हुई और सुबह 9.30 बजे मुनि श्री ससंघ की आहार चर्या निर्विघ्न संपन्न हुई।

धार्मिक क्रियाओं के सौभाग्यशाली परिवार
पर्यूषण पर्व के प्रथम दिन जिनालय में विविध धार्मिक क्रियाओं को संपन्न कराने का पुण्य लाभ श्रद्धालुओं को प्राप्त हुआ। प्रथम 4 स्वर्ण कलशों से श्रीजी का प्रथम अभिषेक करने का सौभाग्य सनत कुमार जैन, संजय जैन सतना, सुमित पंड्या एवं धर्मचंद जी गंगवाल को प्राप्त हुआ। विश्व शांति एवं सुख-समृद्धि की कामना हेतु रिद्धि-सिद्धि प्रदाता शांतिधारा करने का पुण्य लाभ सनत कुमार जैन, मनोज जैन, रोमिल जैन, सौम्य कुमार जैन एवं चूड़ीवाला परिवार को प्राप्त हुआ। मूलनायक भगवान के ऊपर प्रथम छत्र अर्पित करने का सौभाग्य प्रीतम जैन, श्रीमती सरिता जैन, श्रद्धेय जैन एवं श्रीमती दीप्ति जैन को प्राप्त हुआ।
मुनि श्री आगम सागर जी महाराज की मंगल देशना: “क्रोध पतन का मूल कारण, प्रेम और सामंजस्य से ही संवरते हैं रिश्ते”
उत्तम क्षमा धर्म के पावन अवसर पर पूज्य मुनि श्री आगम सागर जी महाराज ने अपनी मंगल देशना में मानव मन की चंचलता और क्रोध से होने वाले गंभीर दुष्परिणामों पर अत्यंत व्यावहारिक एवं आध्यात्मिक मार्गदर्शन प्रदान किया। महाराज श्री ने कहा कि जब परिस्थितियां व्यक्ति के अनुकूल नहीं होतीं या उसके मन की बात पूरी नहीं होती, तब उसके भीतर क्रोध का जन्म होता है। विचारणीय विषय यह है कि गुस्सा कभी किसी समस्या का समाधान नहीं हो सकता।

गुस्से से कोई काम बनता नहीं, बल्कि बना-बनाया काम भी पूरी तरह बिगड़ जाता है।
क्रोध के शारीरिक, मानसिक और सामाजिक दुष्परिणाम
मुनि श्री ने क्रोध के गंभीर प्रभावों को विस्तार से समझाते हुए कहा कि जब व्यक्ति गुस्सा करता है, तो उसके देखने और सोचने के भाव पूरी तरह बदल जाते हैं। क्रोध का प्रभाव केवल विचारों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि यह पूरे वातावरण को नकारात्मक बना देता है।
उन्होंने वात्सल्यपूर्ण दृष्टांत देते हुए बताया कि यदि एक मां अत्यधिक गुस्से की स्थिति में अपने बच्चे को दूध पिलाती है, तो वह दूध भी विष के समान हानिकारक हो जाता है। क्रोध से जीवन में कभी ऊंचाई और प्रगति हासिल नहीं होती, बल्कि व्यक्ति का पतन होता है। जिस व्यक्ति पर हम गुस्सा करते हैं, उससे अनजाने में ही दुश्मनी पैदा हो जाती है और यह दुश्मनी केवल इसी जन्म तक सीमित न रहकर जन्म-जन्मांतर का बैर बन जाती है।

पारिवारिक जीवन में सामंजस्य और दृष्टिकोण में बदलाव आज के समय में हर व्यक्ति यह उम्मीद रखता है कि पूरी दुनिया और घर के सभी सदस्य उसके हिसाब से चलें। मुनि श्री ने इस सोच को बदलने का आह्वान करते हुए कहा कि जब बच्चे बड़े हो जाएं और पिता के जूते बच्चे के पैर में आने लगें, तो उन पर गुस्सा करने या दबाव बनाने के बजाय उनके साथ मित्रवत व्यवहार करना चाहिए।
उन्होंने सवाल किया कि हम कब तक केवल अपनी मनमानी करेंगे? परिवार और समाज में प्रेम भाव तभी बना रह सकता है जब संतुलन हो। यदि आप अपनी चार बातें दूसरों से मनवाते हैं, तो आपका भी यह कर्तव्य बनता है कि आप दूसरों की बातें भी सुनें और मानें। जो व्यक्ति केवल अपनी मनमानी पर अड़ा रहता है, वह एक दिन अपनों के बीच भी अकेला पड़ जाता है। उन्होंने आगे कहा कि आज हमारी सबसे बड़ी भूल यह है कि हम केवल दूसरों को सुधरते देखना चाहते हैं, स्वयं में बदलाव नहीं करना चाहते। जबकि जीवन का सच्चा नियम यही है कि “हम सुधरेंगे, तो जग सुधरेगा।” दुश्मनी समाप्त कर प्रेम बढ़ाने के छः व्यावहारिक सूत्र में महाराज श्री ने आपसी कड़वाहट को खत्म करने और संबंधों में आत्मीयता घोलने के लिए छः सरल एवं प्रभावी बातें बताईं: पहला – दूसरों के पास जाना और उन्हें अपने पास बुलाना,दूसरा – दूसरों की बातें सुनना और अपनी बात उन्हें सुनाना,तीसरा – दूसरों के साथ खाना और उन्हें आदरपूर्वक खिलाना
उन्होंने कहा कि जब लोग आपस में मिलना-जुलना, संवाद करना और साथ बैठकर भोजन करना शुरू करते हैं, तो बड़े से बड़ा बैर भाव भी समाप्त हो जाता है। प्रवचन के समापन पर मुनि श्री ने सभी श्रद्धालुओं को अपने भीतर के क्रोध को त्यागकर संयम, क्षमा और प्रेम के साथ जीवन जीने का संकल्प दिलाया।
दशलक्षण पर्व के प्रथम दिन मंदिर जी में दिनभर धर्म और भक्ति का आलौकिक वातावरण बना रहा। पर्यूषण पर्व की अवधि में प्रतिदिन प्रातः 5.30 बजे से रात्रि 8.30 बजे तक विभिन्न धार्मिक, अध्यात्मिक एवं सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित किए जाएंगे।
समयोपदेश वर्षायोग 2026 समिति एवं सकल दिगम्बर जैन समाज ने समस्त धर्मानुरागी बंधुओं से निवेदन किया है कि वे अधिक से अधिक संख्या में उपस्थित होकर मुनि श्री के प्रवचनों का श्रवण करें एवं जिन-भक्ति कर धर्म लाभ अर्जित करें।

