जैसा परिवेश होगा वैसे संस्कार पड़ेंगे : आचार्य बांके बिहारी गोस्वामी

जैसा परिवेश होगा वैसे संस्कार पड़ेंगे : आचार्य बांके बिहारी गोस्वामी


राजनांदगांव(अमर छत्तीसगढ़) । 15 सितम्बर ।
श्री अग्रसेन भवन में आयोजित श्रीमद् भागवत कथा ज्ञान यज्ञ सप्ताह के तृतीय दिवस व्यास पीठ पर विराजित सुप्रसिद्ध भगवताचार्य बांके बिहारी गोस्वामी ने कहा कि हम जो भी कार्य करते हैं वह परमेश्वर द्वारा ही कराया जाता है, ऐसा समझ कर किया गया कार्य फलीभूत होता है , यदि हम किसी कार्य का बखान स्वयं द्वारा किए जाने का करते हैं तो उसे कार्य में होने वाली त्रुटि , व्यवधान के दोषी हम स्वयं होते हैं ।

कुलदेवी की कृपा एवं पितृ देवों के आशीर्वाद से कार्य करने का भाव रखने पर का दोष हमें नहीं लगता परमात्मा घट घट के वासी हैं । ध्रुव तारा अपने स्थान पर अटल रहता है व्यक्ति को भी अपने अचार – विचार को स्वच्छ रखते हुए धर्म संस्कृति के प्रति आस्था अटल रखनी चाहिए ।

आचार्य श्री ने कहा कि हम बच्चों को जिस परिवेश में रखेंगे वैसा ही संस्कार उसे प्राप्त होगा इसके लिए आवश्यक है कि हम अपने परिवार का वातावरण सनातन संस्कृति के अनुरूप रखते हुए बालक को शिक्षित होने की प्रेरणा देवे ।


कथा प्रसंग को आगे बढ़ते हुए पूज्य आचार्य श्री ने कहा कि धर्म के प्रभाव से जीव स्वर्ग को प्राप्त करता है आयुष , कीर्ति प्राप्त करता है मृत्यु के पूर्व ना कोई शाखा संबंधी रहता है और ना ही बाद में जीव अकेला आता है एवं अकेला ही जाएगा प्राणी धर्म के माध्यम से सुख शांति समृद्धि आयु संपत्ति को प्राप्त करते हैं एवं आवागमन के बंधनों से छूटकर मोक्ष को प्राप्त करते हैं धर्म प्रत्येक प्राणी का माता-पिता , बंधु भाई , सखा है स्थिति कैसी भी हो धर्म का आश्रय नहीं छोड़ना चाहिए ।

आज प्राणी अपने दुख से दुखी नहीं है बल्कि दूसरे के सुख से दुखी है परमात्मा ने हमें सुंदर देह दी है, दो आंखें प्रभु के दर्शन हेतु , दो कान प्रभु के गुणानुवाद सुनने, मुंह प्रभु का गुणगान करने , दो हाथ प्रभु की वंदना करने , दो पैर प्रभु के मंदिर तक जाने हेतु एवं मन प्रभु भक्ति में लीन रहने हेतु प्रदान की है । इसका सदुपयोग कर भाव बंधन से मुक्ति प्राप्त कर सकते हैं , मन वाणी से किए कर्म फल को भोगना ही पड़ता है ।


० स्त्री का धर्म क्या है : पूज्य आचार्य श्री ने कहा कि स्त्री को सूर्योदय से पूर्व उठाना चाहिए एवं घर में झाड़ू लगानी चाहिए ,स्नानादि से निवृत होकर सुंदर भोजन बनावे एवं प्रभु को भोग लगावे । सास , ससुर , पति , जेठ , ननंद का आदर सत्कार करें एवं छोटों से वात्सल्य भाव रखें । जो स्त्री अपने पति को पलट कर उत्तर देती है वह अधर्मी है ।

धन द्रव्य के समान है इसे संग्रहीत करने से कुमार्ग में चला जाता है अर्थात वह दवा , अस्पताल या छापे में शासन के पास चला जाता है । अतः धन का सदुपयोग करें । धन को धर्म – दान कार्य में लगावे तो वह बढ़ता जाता है । सत्य के आचरण से धन को प्राप्त करने का प्रयास करें । छत पर रुका हुआ पानी भी दीवार को तोड़कर अपने लिए मार्ग बनाकर टपकने लगता है ,धन को दान – धर्म में लगावे , तीर्थ में लगावे तो पुण्य फल की प्राप्ति होती है।
पूज्य आचार्य श्री ने कहा कि गुरु अपने शिष्य को, पिता अपने पुत्र को और राजा अपनी प्रजा को धर्म का उपदेश नहीं देती तो वह उसके द्वारा किए गए पापों के लिए स्वयं दोषी होते है । अतः गुरु अपने शिष्य को , पिता अपने पुत्र को एवं राजा अपनी प्रजा को धर्म की शिक्षा देवे , जिससे उसका एवं सबका कल्याण होगा। हम जैसा बीज बोएंगे वैसा ही फल प्राप्त होगा । गीता में भगवान कृष्ण ने अर्जुन को उपदेश दिया कि कर्म करो , इच्छाओं से परे हो जाओ, क्या परिणाम होगा उस पर विचार ना करो एवं कार्य का निष्पादन करो यही धर्म है ।


पूज्य आचार्य श्री ने कहा कि व्यक्ति को अपनी चारपाई से उठते समय चारपाई में ही प्रभु का स्मरण करना चाहिए , रात्रि में विश्राम करने के पूर्व चारपाई में पहुंचकर प्रभु का धन्यवाद करें कि वह आज का दिन आनंद से व्यक्तित्व कर सका और अपने कर्मों को समर्पित कर देवे ।

भोजन – वस्त्र आदि प्रभु के चरणों में निवेदित कर ग्रहण करें तो प्रसाद बन जाता है । दूसरे के दुर्गुणों को नहीं वरन सद्गुणों को देखना चाहिए ।


0 साधु से तात्पर्य : पूज्य आचार्य श्री ने कहा कि साधु वह व्यक्ति है जो सत्पुरुष , मृदुभाषी , आज्ञाकारी , धर्मज्ञ , दयालु प्रवृत्ति दूसरों के दुखी से दुखी होने वाला व्यक्ति हो वह साधु है । सूपा का उदाहरण देते हुए आचार्य श्री ने कहा की सूपा से अनाज सुधारने पर जो कंकर – कचरा – डंठल इत्यादि होते हैं वह सामने आकर बाहर गिर जाते हैं ।

वहीं शुद्ध अनाज पीछे की ओर चला जाता है , साधु के गुण को अपने अंदर उतारे । एक जीव को माता-पिता गुरु , बुजुर्ग के अनुभव रूपी ज्ञान से शिक्षा प्राप्त करनी चाहिए , जिससे जीवन सफल हो सके । मोह का चक्र व्याधियों का मूल है इसमें ना पड़े । वृक्ष हमें जीवन देते हैं इसके संरक्षण की जिम्मेदारी प्रत्येक नागरिक की है । गंगा की महिमा अपरंपार है उसका आचमन , स्नान तथा उसकी रज को मस्तक पर लगाने से जीवन धन्य हो जाता है एवं पाप नष्ट हो जाते हैं ।

घर पर स्नान करते हुए भी हर-हर गंगे का उच्चारण करने से गंगा स्नान के पुण्य का फल प्राप्त होता है । हमारी संस्कृति में अतिथि को देवों के समान माना गया है अतिथि का सदैव सत्कार करें । कथा प्रसंग में हिरणकश्यप वध एवं भक्त प्रहलाद की सजीव झांकी की प्रस्तुति की गई ।

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