रायपुर (अमर छत्तीसगढ़) 23 सितंबर । समयोपदेश वर्षायोग 2026 के अंतर्गत श्री दिगम्बर जैन बड़ा मंदिर, मालवीय रोड, रायपुर में दशलक्षण पर्यूषण महापर्व के आठवें दिन उत्तम त्याग धर्म अत्यंत श्रद्धा, भक्ति और हर्षोल्लास के साथ मनाया गया। इस पावन अवसर पर पूज्य मुनि श्री 108 आगम सागर जी महाराज, पूज्य मुनि श्री 108 पुनीत सागर जी महाराज एवं पूज्य ऐलक ससंघ के पावन सान्निध्य में प्रात:काल से ही धार्मिक अनुष्ठानों की धूम रही।
वर्षायोग समिति के अध्यक्ष नरेंद्र जैन गुरुकृपा, एवं कार्यकारी अध्यक्ष संजय नायक जैन ने संयुक्त रूप से बताया कि उत्तम त्याग धर्म के शुभ अवसर पर जिनेन्द्र देव का प्रथम 4 इन्द्रों के रूप में स्वर्ण कलशों से अभिषेक करने का परम सौभाग्य श्री शरद कुमार जैन, शिशिर जैन, विज्ञान कुमार जैन, पूर्वांश कुमार जैन, सनत गंगवाल, सुमित गंगवाल, श्लोक गंगवाल, प्रवीण जैन, शुभम जैन, स्पर्श जैन, किरण जैन, विजय कस्तूरे, श्रीमती सरोज कस्तूरे, छाया, प्रज्ञा, आर्या जैन कस्तूरे परिवार को प्राप्त हुआ सम्पूर्ण विश्व शांति एवं शरद कुमार जैन के उत्तम स्वास्थ्य लाभ हेतु चमत्कारिक रिद्धि-सिद्धि शांतिधारा करने का सौभाग्य श्री भरत जैन भोरावत, श्री हर्षवर्धन भोरावत, प्रिंस भोरावत (भोरावत परिवार) को प्राप्त हुआ।
मूलनायक भगवान का अभिषेक श्री सुमित पंड्या, श्रीमती मिली पंड्या लाभांडी द्वारा तथा मूलनायक भगवान की शांतिधारा त्रिकाल चौबीसी में भगवान विराजमान करने वाले श्री श्रेयश जैन, श्रीमती रुचि जैन, वंशिका जैन, निर्वी जैन (टैगोर नगर, रायपुर) द्वारा संपन्न की गई। नवयुवक मंडल द्वारा मुनि श्री का पाद प्रक्षालन किया गया। नवयुवती मंडल द्वारा शास्त्र भेट किया गया।
मुनि ससंघ को नवधा भक्तिपूर्वक आहारदान
दोपहर में परम पूज्य मुनि ससंघ को नवधा भक्ति से विशुद्ध आहार कराने का महान पुण्यार्जन मुनि श्री 108 आगम सागर जी महाराज: राजकुमार मोदी, श्रीमती शकुंतला मोदी, नवीन मोदी, श्रीमती कविता मोदी, नमन मोदी, श्रीमती आशिका, आस्था मोदी परिवार (निज निवास – टैगोर नगर,मुनि 108 पुनीत सागर जी महाराज: श्रीमती सरिता (बेबी दीदी) जैन (निज निवास – गणेश रामनगर, ऐलक श्री धैर्य सागर जी महाराज: श्रीमती निशि शुभचंद , श्रीमती शिल्पी मनोज , श्रीमती रजनी सूयंक जैन, प्रियंक, आयुषी, श्रेयांशी जैन (निज निवास – मिलेनियम प्लाजा रोड, इत्र वाला के सामने, बांस टॉल, ऐलक श्री स्वागत सागर जी महाराज: श्रीमती पुष्पादेवी बंशीलाल जैन (जैन बाड़ा)
मुनि श्री 108 आगम सागर जी महाराज की मंगल प्रवचन देशना
धर्मसभा को संबोधित करते हुए पूज्य मुनि श्री 108 आगम सागर जी महाराज ने उत्तम त्याग धर्म के गूढ़ रहस्यों पर प्रकाश डालते हुए बताया कि जैन शास्त्रों के अनुसार मनुष्य को सदैव अपने ही कृत कर्मों का फल प्राप्त होता है।
त्याग और दान की महिमा को रेखांकित करते हुए मुनि श्री ने रामायण का एक सुंदर प्रसंग सुनाया। उन्होंने बताया कि श्री राम की माता पूर्व जन्म में अपने घर में मुनिराज के आहार हेतु नवधा भक्तिपूर्वक चौक लगाती थीं और बच्चों से मुनिराज का पड़गाहन करने को कहती थीं। परंतु बच्चे खेलकूद में व्यस्त रहने के कारण पड़गाहन के समय मुनिराज के समक्ष न जाकर बाद में केवल आहार की कुशलक्षेम पूछते थे।
पूर्व जन्म में मुनिराज के पड़गाहन का पावन अवसर गंवाने के कारण ही श्री राम को राजसिंहासन प्राप्त होने के ऐन वक्त पर वनवास जाना पड़ा। यह प्रसंग शिक्षा देता है कि दान और भक्ति के अवसरों को कभी व्यर्थ नहीं गंवाना चाहिए।

दान के महत्व पर देशना देते हुए मुनि श्री ने कहा कि संसार में दान देने वाले का नाम सदा प्रथम आता है। दान से व्यक्ति की यश और कीर्ति किसी मांग के बिना ही पूरी दुनिया में फैलती है। त्याग और दान से कभी धन या वैभव घटता नहीं, बल्कि बहुगुणी होकर बढ़ जाता है। जो जीव नम्रता और विनय भाव के साथ दान देता है, उसका सर्वत्र आदर-सत्कार होता है।
विनयपूर्वक दिया गया दान जीव के निर्वाण प्राप्त कर लेने के पश्चात भी युगों-युगों तक उसकी यश-कीर्ति को जीवित रखता है। जिस प्रकार भरत को राजपद मिला, उसी प्रकार सच्चा दान दाता को समस्त सुख प्रदान करता है। मुनि श्री ने प्रेरणा दी कि जिनके पास तन, मन या धन का सुख नहीं है, उन्हें दान अवश्य देना चाहिए, क्योंकि दान देने से ही आगामी भवों में समस्त सुखों की प्राप्ति होती है।
प्रवचन के दौरान मुनि श्री ने जैन परंपरा के अनुसार आठ प्रमुख दानों और धर्म कार्यों का उल्लेख किया, जिससे जीव की यशोपताका संपूर्ण लोक में फहराती है: जिन मंदिर का निर्माण करवाना ,जिन बिंब की स्थापना करवाना,पवित्र तीर्थ क्षेत्रों की यात्रा करना,पंचकल्याणक महोत्सव करवाना,पूज्य मुनिराजों को नवधा भक्ति से आहार कराना,मुनिराजों के विहार में वैयावृत्ति और सहयोग देना,ज्ञान दान एवं शास्त्र स्वाध्याय में सहयोग करना,औषध एवं अभय दान प्रदान करना।
मुनि श्री ने स्पष्ट किया कि मुनि जीवन स्वयं ज्ञान दान और संयम का दान देता है, जबकि श्रावक का परम कर्तव्य आहार दान, औषध दान, अभय दान और आवास दान देना है। उन्होंने ताकीद की कि तप और त्याग करने वाले साधक को कभी भी अभिमान नहीं करना चाहिए। दिगंबर मुद्रा और वीतरागी संतों की कृपा से ही जीव को संसार के सारे सुख प्राप्त होते हैं और दान देने का यह अनंत पुण्य जन्म-जन्मांतर तक अपार सुखों का कारण बनता है।
अपने प्रवचन के अंत में मुनि श्री ने संसार चक्र के कारणों पर सचेत करते हुए कहा कि ऋण, हत्या और बैर भाव ऐसी तीन चीजें हैं जो जीव के पुनर्जन्म और निरंतर संसार भ्रमण का मुख्य कारण बनती हैं। इसलिए प्रत्येक भव्य जीव को इन तीनों से सदैव बचकर उत्तम त्याग धर्म को अपने जीवन में धारण करना चाहिए।
कार्यक्रम के अंत में सकल दिगंबर जैन समाज रायपुर, समयोपदेश वर्षायोग समिति 2026 तथा श्री दिगम्बर जैन बड़ा मंदिर मालवीय रोड के पदाधिकारियों एवं श्रद्धालुओं ने पूज्य मुनि ससंघ के चरणों में श्रीफल अर्पित कर आशीर्वाद प्राप्त किया।

