राजनांदगांव(अमर छत्तीसगढ़) 23 सितम्बर। ” अपने विचारों को कभी मत रोको उसे बहने दो, बस उसे अपने नियंत्रण में रखो और यदि वह अनियंत्रित हो रहा है तो उसकी दिशा बदल दो!” उक्त उदगार खरतर गच्छाधिपति मणिप्रभ सागर जी के सुशिष्य श्रेयांशप्रभ सागर जी ने व्यक्त किए।
मीडिया प्रभारी विमल हाजरा ने बताया कि ज्ञान वल्ल्भ उपाश्रय भवन में चल रहे चातुर्मासिक प्रवचन की कड़ी में आज मुनि श्री श्रेयांशप्रभ सागर जी ने फरमाया कि कोई भी ऐसा व्यक्ति नहीं हुआ है जो अपने दिमाग के कचरे को पूरी तरह बाहर निकाल पाया हो। जब तक केवल ज्ञान ना मिल जाए तब तक दिमाग के कचरे को पूरी तरह से बाहर नहीं निकाला जा सकता। उन्होंने कहा कि इसी तरह विचारों को भी नहीं रोका जा सकता। विचारों को आने दो, चाहे वह अच्छे हो या बुरे। इसे नियंत्रित करो और अच्छे विचारों को फैलने दो।
मुनि श्री ने कहा कि विचार ही हमें आगे बढ़ाने वाला होता है और विचार ही हमें गिराने वाला होता है। हमारे बीच फर्क विचार ही लाता है। जहां विचार है,वहीं मन है। मन का प्रोसेस भी वहीं से चलता है। जैसा हमारा विचार होगा वैसी ही हमारी भाषा भी होगी और वैसा ही हमारा व्यवहार भी होगा। हमारा आचरण भी विचार के अनुरुप होता है। उन्होंने कहा कि हम माला तो फिरते हैं किंतु हमारा मन नहीं टिकता। हम मन को दोष देते हैं कि वह नहीं टिक रहा है। उन्होंने कहा कि इसमें मन की कोई गलती नहीं है,मन तो आपकी बात मानता है। आपने मन को कहा कि वह टिकता नहीं है तो फिर वह नहीं टिकता और यदि आपने यह कहा कि मन टिकता है तो वह अवश्य टिकेगा। आप अपना मन परमात्मा की भक्ति में लगाओ और विचारों को एक दिशा दो तो आप अपने लक्ष्य में अवश्य सफल होंगे।

