राजनांदगांव(अमर छत्तीसगढ़) 26 सितम्बर। ” अपेक्षाएं दुखी करती है। एक अपेक्षा की पूर्ति होने के बाद दूसरी अपेक्षा उत्पन्न हो जाती है और यह लगातार बढ़ती ही जाती है। जबकि आशाएं व्यक्ति को दुखी नहीं करती। आशाएं पूरी नहीं होने पर भी व्यक्ति दुखी नहीं होता जबकि अपेक्षाएं टूटने पर व्यक्ति दुखी और क्रोधित हो जाता है। अपेक्षाओं से क्रोध और लोभ जुड़ा हुआ है !” उक्त उदगार खरतर गच्छाधिपति मणिप्रभ सागर जी के सुशिष्य श्रेयांशप्रभ सागर जी ने व्यक्त किए।
मीडिया प्रभारी विमल हाजरा ने बताया कि ज्ञान वल्ल्भ उपाश्रय भवन में चल रहे चातुर्मासिक प्रवचन की कड़ी में आज मुनि श्री श्रेयांशप्रभ सागर जी ने फरमाया कि लोग यदि अपेक्षाएं ना करें तो उनका जीवन खुशियों से भर जाएगा। व्यक्ति को आशाएं जरूर होनी चाहिए।
उन्होंने कहा कि अपेक्षाएं आपको वहां ले जाती जो चीज आपके पास नहीं है। अपेक्षाओं की पूर्ति जितनी होती जाती है उतनी ही वह बढ़ती जाती है। अपेक्षाओं का लोभ बढ़ता जाता है। अच्छे कामों के लिए अपेक्षा होती ही नहीं है। अच्छे कामों के लिए सिर्फ आशाएं होती है।
मुनि श्री ने कहा कि संपूर्ण रूप से निरपेक्ष जीवन जीना थोड़ा कठिन है लेकिन संभव नहीं। जहां आशाएं होती वहां संबंध गहरे होते जाते हैं और जहां अपेक्षाएं होती हैं वहां संबंध टूटते हैं। एक आपको आनंदित करता है तो दूसरा आपको दुखी करता है। आदेश वाली भाषा अपेक्षा से जुड़ी होती है, इसलिए परमात्मा ने कहा है कि आदेश वाली भाषा का प्रयोग मत कीजिए। आदेश पूरा नहीं होता तो अपेक्षाएं टूटती हैं और मन टूटता है तथा दुखी होता है। अपेक्षाएं दूरी बढ़ाती है।

