‎हम झूठ बोलकर पहले स्वयं ‎को ठगते हैं फिर दूसरों को- ‎मौलिकप्रभ जी

‎हम झूठ बोलकर पहले स्वयं ‎को ठगते हैं फिर दूसरों को- ‎मौलिकप्रभ जी


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‎राजनांदगांव(अमर छत्तीसगढ़) 30 सितम्बर। ” माया के लिए झूठ मत बोलो। झूठ बोलकर व्यक्ति पहले स्वयं को ठगता है फिर दूसरों को। व्यापारी को उतना ही रोजगार करना चाहिए जितने में दाल रोटी चल सके। ज्यादा कमाने के चक्कर में झूठ का सहारा लेना पड़ता है और उससे स्वयं को ही नुकसान उठाना पड़ता है। एक बार ग्राहक का विश्वास अगर टूट जाता है तो फिर उसे दोबारा स्थापित नहीं किया जा सकता।” उक्त उदगार खरतर गच्छाधिपति मणिप्रभ सागर जी के सुशिष्य मौलिकप्रभ सागर जी ने  व्यक्त किए।
‎              मीडिया प्रभारी विमल हाजरा ने बताया कि ज्ञान वल्लभ उपाश्रय भवन में चल रहे चातुर्मासिक प्रवचन की कड़ी में आज मुनि श्री मौलिकप्रभ सागर जी ने फरमाया कि हमें स्वयं की प्रशंसा अच्छी लगती है। प्रशंसा में हम फूल जाते हैं और अपने आपको भूल जाते हैं। उन्होंने कहा कि अपनी प्रशंसा में इतना मत डुबो कि स्वयं को ही भूल जाओ। इसे याद रखो कि आप इस दुनिया में क्यों आए हैं और आपके क्या दायित्व हैं। उन्होंने कहा कि आप कभी धर्म की झूठी सौगंध मत लें, नहीं तो इसका नुकसान उठाना पड़ता है।
‎ मुनि श्री मौलिकप्रभ जी ने कहा कि परिवार में असत्य नहीं बोलना चाहिए। किसी भी ऐसे शब्द का उपयोग नहीं करना चाहिए जिससे कि परिवार में झगड़ा हो और लोगों को दिल में ठेस पहुंचे। मिथ्या उपदेश भी किसी को नहीं देना चाहिए। हम दिन भर में पता नहीं कितनी बार झूठ बोल देते हैं। आप इसका चिंतन करें और अपनी शक्तियों को जगाएं तथा कोशिश करें कि आप हमेशा सच बोलें। सच्चा जीवन जियें,सत्य ही आत्मा का गुण है।

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