नगपुरा दुर्ग (अमर छत्तीसगढ)
“मन की सरलता से मन की शुद्धि होती है! मन की शुचिता होने पर ही धर्म टिकेगा। शुचिता से सिद्धि का मार्ग प्रशस्त होगा। विचारों की निर्मलता से आचरण में निर्मलता आती है। शब्द, विचार, और भाव के अनुरूप
मनःस्थिति बनती है। इसलिए मन की शुचिता के लिए शब्द, विचार और भावों को शुद्ध रखना चाहिए।

उक्त उद्गार श्री उवसग्गहरं पार्श्व तीर्थ नगपुरा में चातुर्मास उत्सव अंतर्गत श्री आचारांग सूत्र प्रवचन श्रृंखला में साध्वी श्री लब्धियशा श्री जी म० सा०ने व्यक्त किए।
आराधकों को संबोधित करते हुए साध्वीजी ने कहा कि अन्तरात्मा जब शुद्ध होगी तभी बाहय क्रिया कल्याणकारी बनेगा। धर्म को आदत में डालें। जागृति पूर्वक धर्म की प्रवृति ऐसा हो कि नींद में भी उसकी पुर्नरावृति हो। मायावी और प्रमादी जीव पुनः पुनः जन्म-मरण के चक्र में फंसा रहता है।

स्वयं को प्रकाशित करने के लिए स्वयं को दीपक बनना होगा। जीव स्वयं कर्म करता है। स्वयं कर्म के फल-प्रतिफल को भोगता है। मायावी जीव तिर्यंच गति का आयुष बंध करता है। धर्म में सरलता होना चाहिए, धर्म श्रद्धापूर्वक करना चाहिए, धर्म सदाचार के साथ करना चाहिए। बुरी-से-बुरी परिस्थितियों में पड़ा हुआ मनुष्य भी अपनी कुशलता और मानसिक जागृति से देर-सवेर अच्छी स्थिति को प्राप्त कर सकता है।

अपने सद्गुणों, सद् विचारों एवं सद् प्रयत्नों द्वारा मनुष्य बुरी-से- बुरी परिस्थिति को पार करके ऊँचा उठ सकता है। शरीर को आलस, असंयम, उपेक्षा एवं दुर्व्यसनों में पड़ा रहने दिया जाय तो उसकी सारी विशेषताएँ नष्ट हो जायेगी। मन को भी कुसंस्कार ग्रस्त होने से सम्हाला न जाय, तो उसका कुसंस्कारी, दुर्गुणी, पतनोन्मुखी, आलसी एवं दीन – दरिद्र प्रकृति का बन जाना निश्चित है।

समय की बर्बादी शारीरिक नहीं मानसिक दुर्गुण है। स्वच्छ मन मानव जीवन की सबसे बड़ी सम्पदा है। मन की मलिनता प्रगति के द्वार बंद कर देती है। आत्मा साधना के मार्ग में आगे बढ़ने के लिए प्रमाद सबसे बड़ा शत्रु है। प्रमादी व्यक्ति जीवन में धर्मसाधना नहीं कर सकता। जो कार्य करने योग्य है-उसके प्रति अरुचि तथा जो कार्य नहीं करने योग्य नहीं है उसमें रुचि – यह प्रमाद है। प्रमाद में व्यक्ति अपना अमूल्य समय गंवा देता है।

