रायपुर(अमर छत्तीसगढ)। दादाबाड़ी में आत्मोत्थान चातुर्मास 2025 के अंतर्गत चल रहे प्रवचन श्रृंखला में परम पूज्य श्री हंसकीर्ति श्रीजी म.सा. ने धर्मरत्न प्रकरण ग्रंथ का पठन कर रही हैं। इसी क्रम में मंगलवार को उन्होंने कहा कि संसार में त्याग करने की शक्ति हर किसी में नहीं होती।
बहुत से लोग अपनी पूरी शक्ति को केवल स्वार्थ सिद्धि में लगा देते हैं, लेकिन जब बात धर्म या आत्मिक उन्नति की आती है, तो हम उसमें भी कोई न कोई स्वार्थ खोजने लगते हैं। हमारे भीतर बहुत कुछ कर जाने की क्षमता है, पर दुर्भाग्यवश, हमारे पास कोई स्पष्ट और उच्च उद्देश्य नहीं होता।
जब कोई स्वार्थ या भय सामने आता है, तब हम अपनी सारी शक्ति लगा देते हैं। यही शक्ति अगर धर्म और आत्मा की उन्नति में लगाई जाए, तो जीवन का उद्देश्य पूर्ण हो सकता है।
साध्वीजी ने इसे स्पष्ट करने के लिए एक प्रेरणादायक कहानी सुनाई। उन्होंने बताया कि दो मित्रों को 60 किलोमीटर लंबा और घना जंगल पार करना था। उनके पास काफी धन था जिसे उन्हें दूसरे नगर पहुँचाना था। लेकिन उस जंगल में जंगली जानवरों और डाकुओं का खतरा था।
दोनों मित्र साहस कर चल पड़े। दिन ढलने पर अंधेरा हो गया। चूंकि उनके पास धन था, इसलिए उन्होंने तय किया कि एक व्यक्ति सोएगा और दूसरा पहरेदारी करेगा। योजना के अनुसार एक-एक कर दोनों ने विश्राम लिया और फिर आगे बढ़े।
दोपहर के समय उन्हें तेज भूख लगी। पहले मित्र ने कहा कि अब मैं एक कदम भी आगे नहीं चल सकता, भूख से मेरी हालत खराब है। दूसरे ने कहा कि हम लगभग जंगल के अंत में हैं, अगर हम थोड़ा और चल लें और दिन ढलने से पहले जंगल पार कर लें, तो फिर आराम से भोजन करेंगे। लेकिन पहले मित्र ने जोर देकर कहा कि मैं अब बिल्कुल नहीं चल सकता।
बहस के बाद दोनों ने खाने का डिब्बा खोला ही था कि अचानक पीछे से आवाज आई- पकड़ो इन्हें! भागने मत देना! यह सुनते ही दोनों मित्रों ने धन उठाया और पूरी ताकत से दौड़ना शुरू कर दिया। वे बिना रुके तब तक दौड़ते रहे जब तक जंगल पार नहीं कर लिया और सुरक्षित नगर पहुंच गए।
नगर पहुंचकर दूसरा मित्र पहले से बोला- ‘तुम तो कह रहे थे कि भूख से मर जाओगे और एक कदम भी नहीं चल सकोगे, लेकिन तुम तो पूरे जंगल को दौड़कर पार कर गए!’ पहला मित्र मुस्कराया और बोला- ‘जान है तो जहान है! डर ने मुझे दौड़ने की ताकत दी।’
साध्वीजी इस कथा के माध्यम से समझाती हैं कि हमारे अंदर धर्म और आत्मा की दिशा में चलने की पूरी शक्ति है, लेकिन हमें अभी तक संसार की यात्रा और इसके बंधनों का भय नहीं लगा है।
जिस दिन यह भय भीतर से जाग जाएगा- कि यह संसार केवल मोह और माया का चक्र है, और इससे निकलना ही वास्तविक उद्देश्य है- उस दिन हम एक पल भी इसमें रुकना पसंद नहीं करेंगे।
उस दिन हम आत्मा की समृद्धि की ओर चल पड़ेंगे, संकल्प के साथ, बिना रुके। और यही सच्चा धर्म है- जो आत्मा को मुक्त करे, उसे परम लक्ष्य की ओर ले जाए।
श्री ऋषभदेव मंदिर ट्रस्ट के अध्यक्ष विजय कांकरिया, कार्यकारी अध्यक्ष अभय कुमार भंसाली, आत्मोत्थान चातुर्मास समिति 2025 के अध्यक्ष अमित मुणोत ने बताया कि दादाबाड़ी में सुबह 8.45 से 9.45 बजे साध्वीजी का प्रवचन होगा। आप सभी से निवेदन है कि जिनवाणी का अधिक से अधिक लाभ उठाएं।

