परमात्मा महावीर ने अपने केवल ज्ञान में शोध कर पूरे विश्वशांति का मार्ग बताया- साध्वी मंजुला

परमात्मा महावीर ने अपने केवल ज्ञान में शोध कर पूरे विश्वशांति का मार्ग बताया- साध्वी मंजुला

रायपुर (अमर छत्तीसगढ) 5 अगस्त। शासन दिपिका साध्वी मंजुला श्री जी आत्मा को जागृत करते हुए धर्म सभा को संबोधित करते हुए कहा- हे भव्य उपासकों जैन धर्म का प्रारंभ अरिहंत ऋषभदेव भगवान से प्रारम्भ हुआ और अरिहंत परमात्मा महावीर हमारे 24 वें तीर्थकार है। परमात्मा महावीर परम उपकारी है।

जिन्होने हिंसा के मार्ग में अहिंसा का मार्ग दिखाया, पापो के दलदल कार्य वालों को पुण्य कार्य का वहां कमल खिलाने का मार्ग बताया। द्वेष की आत्मा को प्रेम का सुमन सजाने का मार्ग बताया। संसार में हो रही हर हिंसा को परमात्मा महावीर ने अपने केवल ज्ञान में शोध कर पूरे विश्वशांति का मार्ग बताया है वह है सबके प्रति दया करूणा भाव रखो।

हे भव्य उपासकों- जीवन को बनाने व सुधारने वाली परमात्मा महावीर की जिनवाणी हर जीव जगत का कल्याण मार्ग दया भावना से ही पूरे संसार के हर जीव सुखी रहेंगे। कोरोना काल आया पूरे संसार के लोगो में दया भावना आई सभी एक दूसरे की दया भावना से सेवा की फिर भी जो लोग इस काल की चपेट में आये चले गये। हम उन्हे बचा नहीं पाये?

परमात्मा महावीर संदेश दे रहे है हर जीव पर दया करो जैसा तुम्हें तुम्हारा जीवन अच्छा लगता है वैसा ही व्यवहार दूसरे के साथ करो। ये परमात्मा महावीर ने घोर तप में शोध के बाद ही पूरे संसार को दिशा दी।

हे भव्य उपासकों- हर जीवन आत्मा को जो केवल ज्ञानि, केवलदर्शन जैसी बुद्धि ही उसके किये हुए कर्म के लेखा-जोखा को जान सकती है। हमारी जब तक इन्द्रियाँ हलचल न करती है तब तक आत्मा का संचार समझ में आता है। नाड़ी देखी और बंद हुई आभास हुआ आत्मा चली गई।

हे भव्य उपासकों जैसे पावर हाउस से करेंट आता है और पूरे प्रकाश आदि का संचार हो जाता है। पावर हाउस बंद हुआ तो सारे प्रकाश रोशनी चली गई। ठीक ऐसे ही सारे जीवों के आत्मा के साथ जन्म-मरण होता रहता है।

हे भव्य उपासकों- आत्मा शाश्वत है। शरीर ही सड़न, गलन होता रहता है। उसके कर्म जब तक संसार से बंधे है वह वहीं घुमता रहेगा। ये जन्म-मरण फीक्स है। परमात्मा महावीर संदेश दे रहे है जो जीव हर जीवन के साथ करूणामयी दया के भाव रखेगा वह आत्मा सिद्ध गति को प्राप्त करेगी जन्म-मरण से मुक्ति मिल जायेगी।

ये दया भावना को हमने माता मरूदेवी जो हाथी में बैठी-बैठी ही सिद्ध परमात्मा बन गई। ऐसे ही अनेक इत्हिास हमने सुने जाना है। हमें भी परमात्मा ने यह शरीर आत्मा

दिया है इसे इन्द्रियों और कषायों से मुक्त बनाकर हर जीव पर दया करते चलो तो मोक्ष मंजिल को पा लोगे।

हे भव्य उपासकों- धन्नाशाली भद्र खाट लेकर घर पहुंचा तीनो भाई पिताजी से कहे ये मरे हुए आदमी का खाट लाया है पूरे गांव, शहर में इसकी निंदा हो रही है। आप इसे डाटो।

पिताजी कहे धन्ना ने खाट सोच समझकर ही लाया होगा। पिताजी धन्ना को बुलाकर कहा बताओं क्यों इसे लाये धन्ना ने पलंग के खूटे निकाले और रत्नों का भंडार पूरे जमीन में फैल गया। पिता ने कहा देखो धन्ना ने पुण्यवाणी से ये रत्न पाये।

ये देख तीनो भाई के चेहरे काले पड गये पर उन्हे धन्ना की प्रशंसा सहन नही हो रही थी। तीनो ने कहा पिताजी धन्ना कितना होशियार है जब उसे मालूम था तो कंजूस सेठ के बेटे और शम्शान पालक को क्यों नही बताया। आप बोले यह उचित है अनुचित ?

हे भव्य उपासकों जो चक्रवर्ती और पुण्यशाली होते है उनके साथ रिद्धी निधीयाँ चलती है। ये निधीयाँ उनकी वह काल करेगा या दिक्षा लेगा। वहीं रिद्धी निधीयाँ रहेगी। नहीं तो ये सारी रिद्धी निधियाँ जमीन पर चली जायेगी। पिताजी धन्ना की पुण्यवाणी से ये सब जान समझ लिया।

धन्ना ने ये रत्नो को परिवार और तीनो भाईयो को और पिताजी को बांट दिया। ये सब बांटने के बाद भी धन्ना अपने पास कुछ नही रखा। उसे धन के मोह के प्रति आशक्ति थी। पिता ने तीनो बेटो से कहा शांत रहो। अब आगे क्या होता है जानेंगे क्रमशः

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