मेहंदी सांझी और मंगल गीत से गूंजा दादाबाड़ी प्रांगण…. मानव जीवन भोग-विलास के लिए नहीं, आत्मा के उत्थान और शुद्धिकरण का साधन है: साध्वी हंसकीर्ति श्रीजी

मेहंदी सांझी और मंगल गीत से गूंजा दादाबाड़ी प्रांगण…. मानव जीवन भोग-विलास के लिए नहीं, आत्मा के उत्थान और शुद्धिकरण का साधन है: साध्वी हंसकीर्ति श्रीजी

रायपुर(अमर छत्तीसगढ) 17 अगस्त। आत्मोत्थान चातुर्मास 2025 के अंतर्गत रविवार को दादाबाड़ी में आयोजित प्रवचन में परम पूज्य हंसकीर्ति श्रीजी म.सा. ने कहा कि मानव जीवन केवल भोग-विलास के लिए नहीं है, बल्कि यह आत्मा के उत्थान और शुद्धिकरण का साधन भी है।

जब व्यक्ति अपनी इच्छाओं, वासनाओं और इंद्रियों पर नियंत्रण करना सीखता है, तभी उसका जीवन सार्थक बनता है। इस आत्मनियंत्रण को प्राप्त करने का श्रेष्ठ मार्ग तप और उपवास है।

तप का अर्थ है—संयम और आत्मसंयम के साथ साधना करना। तप से मनुष्य कठिनाइयों को सहने की क्षमता प्राप्त करता है, क्रोध, लोभ, मोह और अहंकार जैसी कषायें नियंत्रित होती हैं। यह आत्मा को बल और मन को स्थिरता प्रदान करता है। तप का अभ्यास हमें सिखाता है कि सुख-दुःख, लाभ-हानि और मान-अपमान में समान भाव रखना ही वास्तविक आध्यात्मिक शक्ति है।

उपवास केवल भोजन का त्याग भर नहीं है, बल्कि यह मन और आत्मा की शुद्धि का माध्यम है। जब हम कुछ समय के लिए अन्न का त्याग करते हैं, तो इंद्रियों पर नियंत्रण बढ़ता है, शरीर हल्का होता है और मन में एकाग्रता आती है। उपवास से आत्मसंयम की भावना प्रबल होती है तथा यह हमें हमारे वास्तविक स्वरूप—आत्मा—की ओर ले जाता है।

धर्मग्रंथों में कहा गया है कि उपवास और तपस्या से संचित पापों का क्षय होता है और आत्मा मोक्ष के मार्ग की ओर अग्रसर होती है। वैज्ञानिक दृष्टि से भी देखा जाए तो उपवास शरीर के विषैले तत्वों को बाहर निकालकर स्वास्थ्य को सुदृढ़ बनाता है।

अतः जीवन में तप और उपवास का अत्यंत महत्व है। ये केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि एक अनुशासित और संतुलित जीवनशैली के प्रतीक हैं। जो व्यक्ति तप और उपवास का नियमित पालन करता है, वह न केवल आत्मिक शांति का अनुभव करता है, बल्कि समाज और परिवार में भी प्रेरणा का स्रोत बनता है।

मेहंदी सांझी और मंगल गीत से गूंजा दादाबाड़ी प्रांगण

श्री जिनकुशलसूरी दादाबाड़ी धाम में चल रहे श्री गिरनार तप पारणा उत्सव का शुभारंभ 16 अगस्त, शनिवार को भक्ति और संस्कृति के अनोखे संगम के साथ हुआ। साध्वी श्री हंसकीर्ति श्रीजी म.सा. आदि ठाणा की पावन निश्रा में हुए कार्यक्रमों ने धर्मनगरी रायपुर को तप, संगीत और संस्कृति की अनूठी अनुभूति से भर दिया।

सुबह का प्रवचन : धर्म और तप का महत्व

प्रातः 9 बजे आयोजित प्रवचन में धर्म और तप की महत्ता पर गहन प्रकाश डाला गया। साध्वी श्रीजी ने तप को आत्मशुद्धि और मोक्षमार्ग का सशक्त साधन बताते हुए सभी को अपने जीवन में तप और संयम अपनाने का संदेश दिया। प्रवचन के दौरान बड़ी संख्या में श्रद्धालु उपस्थित रहे।

मेहंदी सांझी और मंगल गीत : संस्कृति और संगीत का संगम

दोपहर 2 बजे से श्री जिनकुशलसूरी भवन में मेहंदी सांझी और मंगल गीत का आयोजन हुआ। पारंपरिक रंगोलियों, गीत-संगीत और मनमोहक प्रस्तुतियों से सजा यह कार्यक्रम सभी के लिए आनंददायक रहा। श्रीमती नीलिमा जी निमाणी एवं उनकी टीम ने अपनी प्रस्तुति से उपस्थित जनों को भावविभोर कर दिया। कार्यक्रम के पश्चात श्रद्धालुओं के लिए हाई-टी की व्यवस्था की गई।

प्रभुभक्ति संध्या : “जय जय गरवो गिरनार”

रात्रि 8:30 बजे भक्ति रस से ओतप्रोत संगीतमय संध्या “जय जय गरवो गिरनार” का आयोजन हुआ। प्रभुभक्ति से सराबोर इस आयोजन में सुप्रसिद्ध संगीतकारों द्वारा प्रस्तुत भजनों ने वातावरण को आल्हादित कर दिया। पूरा परिसर भक्ति और भावनाओं से गूंज उठा।

ट्रस्ट के अध्यक्ष विजय कांकरिया, कार्यकारी अध्यक्ष अभय कुमार भंसाली तथा आत्मोत्थान चातुर्मास समिति 2025 के अध्यक्ष अमित मुणोत ने जानकारी दी कि दादाबाड़ी में प्रतिदिन सुबह 8:45 से 9:45 बजे तक साध्वीजी के प्रवचन का आयोजन भी हो रहा है।

समस्त श्रद्धालुओं से आग्रह किया गया है कि वे अधिक से अधिक संख्या में उपस्थित होकर जिनवाणी का लाभ लें।

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