राजनांदगांव(अमर छत्तीसगढ) 17अगस्त। श्री विनय कुशल मुनि के सुशिष्य एवं 171 दिन तक उपवास का रिकॉर्ड बनाने वाले जैन मुनि वीरभद्र (विराग) जी ने आज यहां कहा कि जब तक परमात्मा अंदर नहीं बस जाते तब तक भीतर का अहम खत्म नहीं होता।
जरूरत कहां है, अभी हमारे पास यह जागृति नहीं आयी है, जब तक यह जागृति नहीं आएगी तब तक हमारा कर्म किसी काम का नहीं। उन्होंने कहा जागृति आने के बाद विवेक आना जरूरी है और विवेक आने के बाद यह तय करना चाहिए कि मेरी जिम्मेदारी क्या है।
जैन बगीचे के नए हाल में आज अपने चतुर्मासिक प्रवचन में जैन मुनि वीरभद्र (विराग) जी ने कहा कि जागृति आने के बाद हमें विचार करना चाहिए और विचार के बाद ही पूजा शुरू करनी चाहिए।
उन्होंने कहा कि परमात्मा को एक बार सही ढंग से पहचान लें तो हमारे सारे दुख दूर हो जाएंगे। हमारा सारा काम बन जाएगा। परमात्मा का स्वरूप याद कर हमें ध्यान करना होगा यदि परमात्मा के स्वरूप को याद कर हम ध्यान करेंगे तो हम निश्चित ही सफल होंगे। हमें ऐसे परम शक्ति के साथ जुड़ना होगा।
जिससे जुड़ने के बाद हमें कभी दुख नहीं होगा। मीराबाई की तरह परमात्मा को अपने हृदय में बसा लीजिए।
जैन मुनि वीरभद्र (विराग) जी ने कहा कि परमात्मा को हमेशा उत्तम वस्तु ही भेंट करनी चाहिए। उन्होंने कहा कि अक्सर देखने में यह आता है कि भंडारण खुलते ही वह सिक्के व नोट नजर आते हैं जो कहीं चलते ही नहीं! हर स्थिति में परमात्मा की दृष्टि समान होती है।
सुख हो या दुख, हमारे मुंह से हमेशा परमात्मा का नाम निकलते रहना चाहिए। उन्होंने कहा कि जब तक “मैं” शब्द खत्म नहीं हो जाता तब तक अहम भी खत्म नहीं हो सकता।
अहम खत्म करना है तो हृदय में परमात्मा को बसा लो और भक्ति में डूब जाओ। भक्ति में अद्भुत शक्ति होती है। भक्ति के माध्यम से परमात्मा को याद करते हुए मोक्ष मार्ग की ओर बढ़ जाइए। यह जानकरी एक विज्ञप्ति में विमल हाज़रा ने दी।

