जो माता-पिता का नहीं हो सकता वह किसी का नहीं हो सकता.साधु आत्म कल्याण के मार्ग का सहयोगी होता है- मुनि वीरभद्र

जो माता-पिता का नहीं हो सकता वह किसी का नहीं हो सकता.साधु आत्म कल्याण के मार्ग का सहयोगी होता है- मुनि वीरभद्र

राजनांदगांव(अमर छत्तीसगढ) 18 अगस्त। प्रख्यात जैन संत श्री विनय कुशल मुनि ज़ी के सुशिष्य वीरभद्र (विराग) मुनि जी ने आज यहां कहा कि साधुओं का काम उपदेश देना होता है और वह आपके आत्म कल्याण के मार्ग का सहयोगी होता है। साधुओं का खड़े-खड़े वंदन नहीं करना चाहिए।


जैन बगीचे के न्यू हाल में अपने नियमित प्रवचन में जैन मुनि वीरभद्र (विराग) जी ने कहा कि माता-पिता की आज्ञा के सामने कोई भी नहीं है। जो माता-पिता का नहीं हो सकता वह किसी का नहीं हो सकता। क्या करना है, क्या नहीं करना है, इस व्योच (व्यूह) को समझना होगा।

उन्होंने कहा कि साधु आपके आत्म कल्याण की राह का मार्गदर्शक है, इसलिए उनके उपदेशों का पालन करना चाहिए। उन्होंने कहा कि आप लोग आलीशान बंगले में रहते हैं किंतु आपको उपाश्रय का भी ख्याल रखना चाहिए।

उन्होंने कहा कि संयम जीवन के अनुकूल होना चाहिए। आपकी रात अच्छी बीतेगी तो आप दिन में संयम का पालन अच्छी तरह से कर पाएंगे।
मुनि वीरभद्र ( विराग ) जी ने आगे फरमाया कि किसी भी साधु के पास जाओ तो स्वाध्याय के लिए जाओ।

संयम जीवन निर्दोष तरीके से पालन कर सको इसके लिए जागृति लाओ। साधु उपदेश देता है,वह कर्तव्य का बोध कराता है। उपदेश और प्रेरणा में जमीन आसमान का अंतर है। उपदेश सबके लिए होता है जबकि प्रेरणा व्यक्तिगत होता है।

उन्होंने कहा कि हमारा आपके लिए कर्तव्य और आपका हमारे लिए कर्तव्य है। उन्होंने कहा कि हम अपने कर्तव्यों को अच्छी तरह से निभाते हुए आत्म कल्याण के मार्ग में आगे बढ़े। यह जानकारी एक विज्ञप्ति में विमल हाजरा ने दी।

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