रामगुरु ने कहा जीवन में दुःख पैदा करने की फैक्ट्री शरीर और मन ही है, जब हमारे अंदर दुःख पैदा होता है तो समझो हम शरीर मन के केन्द्र से अलग हो गये

रामगुरु ने कहा जीवन में दुःख पैदा करने की फैक्ट्री शरीर और मन ही है, जब हमारे अंदर दुःख पैदा होता है तो समझो हम शरीर मन के केन्द्र से अलग हो गये

देशनोक/रायपुर (अमर छत्तीसगढ) 23 अगस्त व श्री जैन जवाहर मण्डल प्रांगण में धर्म सभा में परम श्रद्धेय आचार्य श्री 1008 रामलालजी म.सा. एवं उपाध्याय प्रवर श्री राजेश मुनिजी म.सा. एवं शासन दिपक श्री प्रकाश मुनिजी एवं श्री विनय मुनिजी आदि ठाणा एवं साथ साधु-साध्वी, श्रावक-श्राविका के समोशाण की धर्मसभा को संबोधित करते हुए रामगुरु ने कहा धर्म प्रेमी बंधुओं जीवन में दुःख पैदा करने की फैक्ट्री शरीर और मन ही है। जब हमारे अंदर दुःख पैदा होता है तो समझो हम शरीर मन के केन्द्र से अलग हो गये है।

जब ये दोनों (मन, शरीर) मजबूत होकर केन्द्र से जोडकर रखा तो हमारा बालबांका भी नहीं होगा। परमात्मा महावीर की शोध साधना इन्हीं केन्द्रों से जुड़ी रहने वाली साधना थी। वे अपनी साधना से शोध कर दुःखों पर विजय प्राप्त कर ली।

श्री उपाध्याय प्रवर राजेश मुनिजी ने सुंदर गीत प्रस्तुत किया आचार्य हमारे उज्जवल सितारे चमक रहे देश में…………

इस अवसर पर शासन दिपक श्री उम्मेद मुनिजी, श्री रामगिरिजी, श्री रामविनीत जी म.सा. ने भी धर्म सभी को सम्बोधित किया। शासन दिपक शोभन मुनिजी पर्युषण पर्व के चतुर्थ दिवस पर अन्तगडदसाओ सूत्र का तृतीय पाठ का वांचन कर धर्म सभा को सम्बोधित करते हुए कहा…. गजसुकुमाल ने अरिहंत अरिष्टनेमि के पास दीक्षा के भावों को जानकर श्रीकृष्ण वासुदेव तुम दीक्षा मत लो।

मैं तुम्हारा द्वारिका नगरी में महामहोत्सव के साथ राज्यभिषेक करूंगा। गजसुकुमाल कृष्ण वासुदेव माता-पिता की आज्ञा मानकर उनका राज्याभिषेक किया गया। फिर माता-पिता ने पूछा बेटा तुम्हारी क्या इच्छा है।

तब कहा रजोहरण, पात्रादि एवं नाई बुलाने का कहा और पूरी तैयारी कर मुखवस्त्र धारण कर, अपने केश का लोच कराया और माता-पिता एवं कृष्ण वासुदेव बड़े महोत्सव के साथ अरिहंत अरिष्टनेमि के पास दीक्षा दिलाई। गजसुकुमाल मुनि तीसरे प्रहर में अरिहंत अरिष्टनेमि के पास आते हैं। मैं आपसे विनती कर रहा हूं, मैं महाकाल श्मशान में एक रात्रि की महाप्रतिमा

(प्रतिज्ञा विशेष) को स्वीकार कर विचरण करना चाहता हूं। वे वहां पहुंचकर दोनों पैरों को साथ मिलाकर ध्यान में लीन हो गये।

वहां सोमिल ब्राहमण हवन सामग्री के लिये उपस्थित था। उसने गजसुकुमाल मुनिजी को देखा तो उसे वैर लेने का सोचता है। इसने मेरी पुत्री सोमश्री को छोड़कर मुनि बन गया। वह बदला लेना चाहता है, चारों तरफ देखा फिर गीली मिट्टी को ग्रहण कर गजसुकुमाल मुनि के सिर पर मिट्टी से पाल बांधता है।

उसमें लाल-लाल खैर की लकड़ी के अंगारे उस पर डालता है। गजसुकुमाल मुनिजी सोमिल ब्राहमण के प्रति द्वेष न करते हुए वेदना सहन सरल भाव से करते है। वे कर्मों को क्षय कर सिद्ध गति को प्राप्त कर लेते हैं।

कृष्ण वासुदेव अरिहंत वासुदेव और गजसुकुमाल मुनि के दर्शनार्थ निकलते है। रास्ते में भूखे-प्यासे वृद्ध को ईंट उठाते उसे घर ले जाते देखते है। कृष्ण वासुदेव भी ईंट उठाकर अनुकम्पा करते है। इसे देख सैंकड़ों लोग भी ईंट उठाते है।

वासुदेव कृष्ण अरिहंत अरिष्टनेमि को वंदन नमन कर पूछा मेरा छोटा भाई गजसुकुमाल मुनि कहां है। अरिष्टनेमि भगवान ने कहा वह तो सिद्ध गति को प्राप्त हो गया। यह कैसे हुआ इस पूरी घटना को अरिष्टनेमि भगवान ने कृष्ण वासुदेव को पूरी जानकारी दी।

कृष्ण वासुदेव ने कहा मेरे भाई को जिसने अकाल में ही उसकी मौत कर दी। वह पुरुष कौन है। अरिहंत अरिष्टनेमि ने कहा कृष्ण वासुदेव उस पुरुष के प्रति द्वेष (गुस्सा) मत लाओ। उसने तो उसे सहायता प्रदान की है।

अरिहंत अरिष्टनेमि ने कृष्ण वासुदेव से कहा जिस प्रकार तुम मेरे दर्शन को आ रहे थे तो एक वृद्ध को ईंट उठाते देख सहायता की थी। इसी प्रकार से गजसुकुमाल मुनि के लाखों भव के संचित कर्मों को क्षय कराने में सहायता उन्हें प्रदान की क्रमशः जारी

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