दुख-दर्द तो स्वयं को ही सहना पड़ता है, भले ही कुशल क्षेम पूछने जगत आ जाए- मुनि वीरभद्र

दुख-दर्द तो स्वयं को ही सहना पड़ता है, भले ही कुशल क्षेम पूछने जगत आ जाए- मुनि वीरभद्र

राजनांदगांव(अमर छत्तीसगढ) 25अगस्त। श्री विनय कुशल मुनि के सुशिष्य एवं 171 दिन तक उपवास का रिकॉर्ड बनाने वाले जैन मुनि वीरभद्र (विराग) जी ने कहा कि दुख-दर्द तो स्वयं को ही सहना पड़ता है, भले ही साता ( कुशल क्षेम) पूछने के लिए जगत आ जाए। इसी तरह कर्मों का फल भी स्वयं को ही भुगतना पड़ता है।
जैन बगीचे के नए हाल में आज अपने नियमित्त प्रवचन में वीरभद्र (विराग) मुनि ने कहा कि हमें परमात्मा के चरण छू लेने मात्र से काफी लाभ मिलता है। जब परमात्मा के चरण छूने से इतना लाभ मिल सकता है तो उनकी भक्ति से हमें कितना लाभ मिलेगा उसकी कल्पना भी हम नहीं कर सकते। उन्होंने कहा कि परमात्मा की भक्ति हमें आत्म कल्याण के मार्ग की ओर ले जाती है।


मुनि वीरभद्र ने फरमाया कि हमें पाप से दूर रहना चाहिए,खासकर सामुदायिक पाप से दूर रहना चाहिए। सामुदायिक पाप कर्म का भयंकर परिणाम होता है। कोरोना की त्रासदी तो पूरे विश्व ने झेली है। इसका परिणाम लोगों ने देखा है, यह सामुदायिक पाप की वजह से हुआ था।

उन्होंने कहा कि आराधना करनी है तो साथ मत देखो। अगर सफल होना है तो आराधना अकेले ही करनी पड़ेगी। अकेले आराधना करने का जो लाभ मिलता है वह सामुदायिक आराधना में कभी नहीं मिल सकता।

उन्होंने कहा कि कर्म सत्ता कहती है कि किसी भी जीव को दुखी नहीं बनाना है तो सामने वाले जीव का भाव समझकर व्यवहार कीजिए। वेदना सहन करते समय समता का भाव बनाए रखिए। उन्होंने कहा कि आराधना कर आत्म कल्याण के मार्ग में आगे बढ़ जाएं। यह जानकारी एक विज्ञप्ति में विमल हाजरा ने दी।

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