पुष्कर राजस्थान (अमर छत्तीसगढ) 25 अगस्त।
श्री मरुधर केसरी रूप सुकन चातुर्मास समिति एवं श्री वर्धमान स्थानकवासी जैन श्रावक संघ के तत्वावधान में श्री मरुधर केसरी पारमार्थिक संस्थान में आयोजित महापर्व पर्युषण के छठवें दिन में धर्म सभा में जैन श्रमण संघ के प्रवर्तक सुकन मुनि महाराज ने कहा कि सिद्ध अवस्था में विशुद्ध चैतन्य का प्रकाशित होना ही ब्रह्मचर्य है। उस अवस्था में आत्म स्वरूप ब्रह्म में रमण करना ही ब्रह्मचर्य है।
विषय तथा विषयी का भेद हट जाने पर, जब आत्म ब्रह्म का साक्षात्कार होता है, तब साधक अखण्ड महाव्रत ब्रह्मचर्य में स्थित रहता है। दश लक्षण धर्म के संदर्भ में ब्रह्मचर्य का अर्थ आत्म-ब्रह्म का आचरण है। साधक का आत्म-ब्रह्म में रत होना है।
विषय वासनाओं में लीन मनुष्य धर्म के तत्व को नहीं पहचान पाता। जो मनुष्य वासना के प्रवाह से दूर आत्म-रूप भागीरथी के तट पर नहीं पहुँचता, वह संसार के प्रवाह में बहता रहता है। काम-भोगों से कर्मों का बंधन होता है। काम-भोगों की लालसा रखनेवाली प्राणी कभी तृप्त नहीं हो पाते।
आंखों में शर्म रखने वाला बहन बेटियों की लाज बचा सकता है – अमृत मुनि
जैन संत उपप्रवर्तक अमृत मुनि महाराज ने कड़क शब्दों में कहा कि गृहस्थ की दृष्टि से परस्त्री के प्रति काम-प्रवृत्ति का उदय ब्रह्मचर्य अवस्था का पतन है। ब्रह्मचर्य की साधना के लिए शारीरिक दृष्टि से आहार का विवेक एवं मलशुद्धि आवश्यक है।
विवाह पूर्व जीवन में ऐसे भोजन से बचना चाहिए जो गरिष्ठ हो तथा विषय वासनाओं को उभारने वाला हो। वासना पर संयम के लिए दैनिक जीवन में योग- साधनों का अभ्यास एवं ध्यान भी आवश्यक है।
विवाह के पश्चात भी व्यक्ति को चाहिए कि वह अपनी पाशविक वृत्तियों को संयमित करे। प्रेम केवल देह-कृत्य नहीं है। भावात्मक लगाव एवं आकर्षण से ही प्रेम सम्बन्धों में स्थायित्व आ सकता है।
शील धर्म का पालनहार देवता से ज्यादा सुख पाता है -महेश मुनि
संत महेश मुनि ने कहा कि शील धर्म को पालने वाला देवता से कई गुना अधिक सुख पाता है। डॉ वरुण मुनि महाराज ने अंतगड़ सूत्र के छठे वर्ग में भगवान महावीर के शासन में मुक्त होने वाली आत्माओं का वर्णन हुआ तो वही अखिलेश मुनि महाराज ने कल्प सूत्र के माध्यम से भगवान महावीर दीक्षा कल्याणक से निर्वाण कल्याणक तक का वर्णन किया।

