पर्युषण के आखिरी दिन संवत्सरी महापर्व पर उमड़े श्रद्धालु, संवत्सरी क्षमा मांगने का महापर्व – सुकन मुनि

पर्युषण के आखिरी दिन संवत्सरी महापर्व पर उमड़े श्रद्धालु, संवत्सरी क्षमा मांगने का महापर्व – सुकन मुनि

पुष्कर राजस्थान (अमर छत्तीसगढ़) 27 अगस्त। श्री मरुधर केसरी रूप सुकन चातुर्मास समिति एवं श्री वर्धमान स्थानकवासी जैन श्रावक संघ के तत्वावधान में श्री मरुधर केसरी पारमार्थिक संस्थान के पुण्य प्रांगण में आयोजित महापर्व पर्युषण के आखिरी दिन संवत्सरी महापर्व के रूप में मनाया गया।

धर्म सभा में जैन श्रमण संघ के प्रवर्तक सुकन मुनि महाराज ने कहा कि जिस प्रकार मन्दिर के ऊपर कलश होता है, उसी प्रकार पर्युषण महापर्व का यह क्षमा दिवस संवत्सरी कलश के समान है, यह शिखर है।

एक दृष्टि से देखा जाय तो इस दिन हमें यह पता लगता है कि हमारे अन्दर कितनी नम्रता, सरलता और विनय का समावेश हुआ। एक-दूसरे से जब हम क्षमा माँगते हैं तो हमारे अन्दर कितनी निष्कपटता होती है ? हमारे हृदय का कितना कूड़ा-कचरा निकल जाता है और हृदय कितना स्वच्छ निर्मल हो जाता है।

क्षमा का आशय यह है कि मन-मस्तिष्क पूरी तरह स्वच्छ हो जाय, मन में किसी प्रकार का वैर-विरोध न रहे। प्रवर्तक सुकन मुनि महाराज ने प्रवचन के दौरान भगवान महावीर से लेकर अबतक का 2500 वर्ष का इतिहास प्रस्तुत किया। जिसको सुनकर श्रद्धालु भाव विभोर हुए।

माफी मांगे बिना जो माफ करे वही भगवान है – अमृत मुनि
उपप्रवर्तक अमृत मुनि महाराज ने बताया कि मन में यदि विरोध रखकर ऊपर शब्दों से क्षमा मांग भी ली जाय तो वह वास्तविक क्षमा नहीं है। वास्तविक क्षमा तो हृदय की निष्कपटता ही है ।

कुछ लोगों ने जैनधर्म की व्यापक क्षमाभावना को कायरता बताकर उस पर दोषारोपण किया है। लेकिन उनका दोषारोपण गलत है। तथ्य यह है कि क्षमा तो वीर ही कर सकता है, कायर तो कभी क्षमा कर ही नहीं सकता।

क्षमापना से जीव को प्रह्लाद भाव – आनन्द एवं प्रसन्नता की अनुभूति होती है। क्षमा लेने-देने से व्यक्ति की सम्पूर्ण व्यक्त और अव्यक्त चेतना शांति और शीतलता से ओत-प्रोत हो जाती है । वह स्वयं को बहुत ही हल्का और प्रसन्न अनुभव करता है।

उसकी कषायें उपशमित हो जाने से उसको आराधना सफल होती है। जो क्षमापना के द्वारा अपनी कषायों को उपशान्त कर लेता है, उसकी समस्त साधना- धर्माराधना पर्वाराधना- सफल होती है। और जो कषायों को उपशमित नहीं करता, उसकी समस्त आराधना, राख में घी डालने के समान व्यर्थ हो जाती है। उसका तप-त्याग आदि सभी कषायों की अग्नि में जलकर खाक हो जाता है।

इस अवसर पर महेश मुनि महाराज ने कहा कि माफी दिल से मांगो, जुबान से बोलने से काम नहीं चलेगा। डॉ वरुण मुनि ने अंतगड़ सूत्र श्री संपन्न करते हुए कहा कि महापुरुषों से प्रेरणा लेकर जीवन को नीतिमान बनाए। वहीं दोपहर को अखिलेश मुनि महाराज की उपस्थिति में आलोचना के पाठ के माध्यम से वर्ष भर की आलोचना करवाई गई।

लुणावत परिवार ने ली नवकार कलश की बोली
संवतसरी महापर्व अवसर पर जैन समाज के भारी तादाद में श्रद्धालु श्रावक श्राविकाएं मौजूद रहे। वही 8 दिन से चले रहे 24 घंटे के अखंड नवकार महामंत्र जाप कलश की बोली श्री वर्धमान स्थानकवासी जैन श्रावक संघ के वरिष्ठ कार्यकर्ता पुखराज जी लुणावत के सुपुत्र भामाशाह संतोष लुणावत ने ली।

चातुर्मास समिति ने कलश की बोली लेने वाले लुणावत परिवार का अभिनंदन किया। इसी अवसर पर पुष्कर तथा बाहर से आए अनेक तपस्वी ने उपवास, बेला, तेला, आयंबिल, पचौला, अट्ठाई आदि के प्रत्याख्यान ग्रहण किए जिनका चातुर्मास समिति ने अभिनंदन किया

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