आराधना ऐसी करनी चाहिए कि परमात्मा का स्वरूप नजर आने लगे… ऐसा आदर्श स्थापित कर जाए कि लोग हमें याद रखें- मुनि वीरभद्र

आराधना ऐसी करनी चाहिए कि परमात्मा का स्वरूप नजर आने लगे… ऐसा आदर्श स्थापित कर जाए कि लोग हमें याद रखें- मुनि वीरभद्र

राजनांदगांव(अमर छत्तीसगढ) 29अगस्त। श्री विनय कुशल मुनि के सुशिष्य एवं 171 दिन तक उपवास का रिकॉर्ड बनाने वाले जैन मुनि वीरभद्र (विराग) जी ने आज यहां कहा कि जगत के समस्त जीवों के लिए, अपने वारिसों के लिए ऐसे आदर्श स्थापित कर जाएं कि वो आपको हमेशा याद रखें। उन्होंने कहा कि यदि हम ऐसा करते हैं तो हमारा जीवन सफल हो जाएगा।


जैन मुनि श्री वीरभद्र(विराग) जी ने उपाश्रय भवन में श्रावकों को संबोधित कर रहे थे। उन्होंने कहा कि हमें आराधना ऐसी करनी चाहिए कि परमात्मा का स्वरूप नजर आने लगे।यदि ऐसा हमने कर लिया तो हमें अपने अंदर अलौकिक आनंद की अनुभूति होगी। हमें अपने भीतर के अवगुण नजर आने लगेंगे। उन्होंने कहा कि भाव से अपनी आलोचना करें। हमें पराधीन जीवन नहीं जीना है, यदि पराधीनता स्वीकार करनी है तो उस परमात्मा की करें।
जैन मुनि श्री वीरभद्र(विराग) जी ने कहा कि भीतर यदि शुद्धता एवं सत्यता हो तो हम परमात्मा में लीन हो जाएंगे। उस परमात्मा से अपनी प्रीत जोड़नी चाहिए। आराधना करना कभी नहीं छोड़ना चाहिए। यदि छोड़ना ही हो तो उसे तब छोड़ें जब आपको उसका फल मिल गया हो।
मुनि श्री वीरभद्र ने कहा कि आत्म कल्याण की जबरदस्त इच्छा मन में हो,आप वैसा कर्म करें। परमात्मा की आज्ञा का पालन करने से हमें जो आशीर्वाद मिलेगा वह निश्चित तौर पर हमें आत्म कल्याण के मार्ग की ओर ले जाएगा। उन्होंने कहा आत्मा को परमात्मा बनाने का हमें सुंदर मौका मिला है,उसे चुकना नहीं चाहिए।

हम अपने अंदर की सारी छवियों को नष्ट करके सुंदर जीवन की शुरुआत करें और परमात्मा की आज्ञा का पालन करते हुए आत्म कल्याण के मार्ग की ओर बढ़े। यह जानकारी एक विज्ञप्ति में विमल हाजरा ने दी।

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