मोक्ष दूर नहीं है, बस हमने उसे दूर बना दिया है- मुनि वीरभद्र

मोक्ष दूर नहीं है, बस हमने उसे दूर बना दिया है- मुनि वीरभद्र

राजनांदगांव(अमर छत्तीसगढ) 4 सितंबर।श्री विनय कुशल मुनि के सुशिष्य एवं 171 दिन तक उपवास का रिकॉर्ड बनाने वाले जैन मुनि वीरभद्र (विराग) जी ने आज यहां कहा कि मोक्ष दूर नहीं है, बस हमने उसे दूर बना दिया है।

हम अपने प्रवृत्तियों में इतने उलझे हुए हैं कि हम मोक्ष की ओर ध्यान नहीं दे पा रहे हैं, हमने क्या-क्या प्रवृत्तियां की है उसका हमें चिंतन करना होगा और यह चिंतन प्रतिक्रमण, स्वाध्याय, सामायिक से ही हो सकता है। प्रतिक्रमण करने से कॉन्फिडेंस आ जाता है।
जैन बगीचे के उपाश्रय भवन में मुनि श्री वीरभद्र(विराग)जी ने कहा कि आज हमें यह क्रियाएं अनुपयोगी लग रही है। जबकि ये “केवल ज्ञान और मोक्ष” पाने के लिए सशक्त माध्यम है। सिद्धि तप करते – करते कई जीवों को “केवल ज्ञान” प्राप्त हो गया और कई ने मोक्ष प्राप्त कर लिया। यह क्रियाएं अमृत है फिर भी हम अमृत पीना नहीं चाहते।

यदि पीते भी हैं तो अमर नहीं हो पाते, इसके पीछे का कारण यह है कि या तो हमने अमृत पिया ही नहीं या फिर हम पीने का तरीका नहीं जानते या फिर हमने पानी ही पिया है, इसीलिए तो हम अमर नहीं हो पाए।
जैन मुनि वीरभद्र (विराग) जी ने कहा कि सब क्रियाएं तो हमें ही करनी है किंतु हम तभी सफल हो पाएंगे जब क्रियाएं करते समय हमारा मन ना भटके। उन्होंने कहा कि मोक्ष दूर नहीं है।

हम अपनी आत्मा को उन तत्वों से बाधित कर देते हैं जिससे यह सरल मार्ग भी हमारे लिए कठिन हो जाता है। हमारी आत्मा विचलित हो जाती है और हम आराधना से भटक जाते हैं।

मुनिश्री ने फरमाया कि स्वाद छोड़ना आसान है और स्वाद लेना भी आसान है किंतु स्वाद पर विजय श्री पाना आसान नहीं है। भोग तो शरीर रहा है आत्मा नहीं। उन्होंने कहा कि तपस्या करते-करते अंदर के कुसंस्कार कमजोर हो जाते हैं। इसे हमें धीरे-धीरे खत्म कर आराधना के मार्ग में आगे बढ़ना होगा तभी हम आत्म कल्याण कर पाएंगे। यह जानकारी एक विज्ञप्ति में विमल हाजरा ने दी।

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