राजनांदगांव(अमर छत्तीसगढ) 7 सितम्बर। प्रख्यात जैन संत श्री विनय कुशल मुनि के सुशिष्य श्री वीरभद्र (विराग )जी ने आज यहां कहा कि भगवान हमें देख रहे हैं, जो मोक्ष दे सकते हैं वह हमें क्या-क्या नहीं दे सकते। स्वाध्याय-प्रतिक्रमण आदि से आत्मा संस्कारित होती है। हमारी क्रियाएं ऐसी होनी चाहिए जो हमें उन तक ले जा सके।
जैन बगीचे के उपाश्रय भवन में आज मुनि श्री वीरभद्र (विराग) जी ने कहा कि आत्मा संस्कारित होने पर हम अपने अवगुणों को अपनी क्रियाओं से कमजोर कर सकते हैं और हम आत्म कल्याण के मार्ग में आगे बढ़ सकते हैं। मुनि श्री ने कहा कि जो त्याग करना है अभी ही त्याग कर दो क्योंकि वर्तमान समय ही हमारे हाथ है, भूतकाल तो गुजर गया है और भविष्य को किसने देखा है भविष्य में तो काल है।
मुनि श्री वीरभद्र (विराग) जी ने कहा कि सबको पता है कि हम सबको यहीं सब कुछ छोड़कर जाना है इस शरीर से आपने क्या कमाया? उन्होंने कहा कि जब यह शरीर हमारा नहीं रहेगा तो हमारे हाथ में क्या रहेगा,सिर्फ जीरो ही हाथ में रहेगा, इसलिए यह शरीर मिला है तो इसका कुछ फायदा ही उठा लेते, कुछ आराधना ही कर लेते जो हमारे साथ जाता। मुनि श्री ने पूछा कि हमें यह देह मिला है तो हम इसका फायदा क्यों नहीं उठाते? इस शरीर से एक काम किया जा सकता है और वो है स्वाध्याय या आराधना जैसा धर्म तप। आप छोटा सा अनुष्ठान करें किंतु सत्य है कि वह आपके आत्म कल्याण के लिए हो। यह जानकारी एक विज्ञप्ति में विमल हाजरा ने दी।

