राजनांदगांव(अमर छत्तीसगढ़) 9 सितंबर। प्रख्यात संत श्री विनय कुशल मुनि के सुशिष्य एवं 171 उपवास का रिकॉर्ड बनाने वाले जैन मुनि श्री वीरभद्र (विराग) जी ने आज यहां कहा कि कोई भी पदार्थ साथ जाने वाला नहीं है।
काल के साथ सब नष्ट हो जाने वाला है।ईर्ष्या नैसर्गिक तौर पर रहती है। हम छोटी-छोटी संपत्तियों के लिए अपनों से ही द्वेष, ईर्ष्या और हिंसा का भाव रखते हैं,जो प्रॉपर्टी हमारे साथ जाने वाली ही नहीं है, फिर उसके लिए द्वेष भाव क्यों रखना। उन्होंने कहा कि ख़ौलते पानी में कभी चेहरा नहीं दिखता, चेहरा तो शांत पानी में ही दिखता है।
जैन बगीचे के उपाश्रय भवन में मुनि श्री वीरभद्र(विराग)जी ने कहा कि प्रॉपर्टी इसी भव में हाथ में रहेगी या नहीं, कहा नहीं जा सकता,जबकि द्वेष भाव जन्म-जन्मांतर तक रहता है, यही नहीं वह अनंत काल तक रहता है।
उन्होंने कहा कि हम टेंपरेरी वस्तु के लिए अनंत काल तक नुकसान क्यों उठाएं? अपनों के लिए कभी द्वेष भाव नहीं रखना चाहिए, यदि द्वेष भाव रखें तो हम टूट कर बिखर जाएंगे।
मुनि श्री वीरभद्र (विराग) जी ने कहा कि हम अपने ही लोगों को अपने से दूर कर देते हैं और पराये को अपने में शामिल कर लेते हैं यह सब द्वेष भाव के चलते होता है परंतु इससे काफी नुकसान हमको ही होता है।
उन्होंने कहा कि इसका पता हमें तब चलता है जब हमें नुकसान हो चुका होता है। हम दिमाग में बैठा लेते हैं कि वह व्यक्ति हमारा दुश्मन है, वह हमेशा मेरे खिलाफ ही रहता है जबकि वास्तविकता कुछ और हो सकती है, हो सकता है कि वह ऐसा किसी नियम के तहत कर रहा हो। हम उसके प्रति द्वेष भाव पैदा कर लेते हैं।
मुनि श्री वीरभद्र (विराग) जी ने कहा कि हमें किधर जाना है दिशा तो यही तय करनी होगी। यदि दिशा नहीं तय कर पाए तो पता नहीं कितने भव तक हम भटकते रहेंगे। दिशा तय करने और उसे मार्ग पर बढ़ जाएं ताकि आप अपने लक्ष्य तक जल्दी पहुंचे।
मुनि श्री ने कहा कि हम ख़ौलते पानी में चेहरा देखेंगे तो कभी नहीं दिखेगा, चेहरा तो हमारा शांत पानी में ही दिखेगा। हर क्षण कल्पना आती – जाती रहती है किंतु इनमें से अधिकांश कल्पना दिशाहीन होती है। यदि भीतर ज्ञान आ जाए तो यह आलतू फालतू की कल्पनाएं भीतर प्रवेश ही नहीं करेगी।
उन्होंने आराधना का मार्ग अपनाकर आत्म कल्याण करें। यह जानकारी एक विज्ञप्ति में विमल हाजरा ने दी।

