हम शरीर की ज्यादा चिंता करते हैं,आत्मा की नहीं- मुनि वीरभद्र

हम शरीर की ज्यादा चिंता करते हैं,आत्मा की नहीं- मुनि वीरभद्र

राजनांदगांव(अमर छत्तीसगढ) 23 सितंबर।श्री विनय कुशल मुनि के सुशिष्य एवं 171 दिन तक उपवास का रिकॉर्ड बनाने वाले जैन मुनि वीरभद्र (विराग) जी ने आज यहां कहा कि हमारी दृष्टि ऐसी होनी चाहिए कि हमें कोई शत्रु नजर ना आए। हम यह सोचे कि आज जो मेरा शत्रु है, वह कभी मेरा मित्र रहा था।

आज जो भी है वह कभी न कभी मेरे रिश्तेदार थे। उन्होंने कहा कि यदि हम यह दृष्टि अपना लें तो निश्चित मानिए कि हम आत्म कल्याण के मार्ग की ओर बढ़ रहे हैं।
जैन बगीचे के उपाश्रय भवन में आज मुनि वीरभद्र (विराग) ज़ी ने कहा कि हम चिंता किसकी करते हैं शरीर की या आत्मा की। उन्होंने कहा कि दरअसल हम शरीर की ज्यादा चिंता करते हैं, आत्मा की नहीं।

हम उपवास भी रखते हैं तो हमारा ध्यान शरीर की ओर रहता है, कि कहीं मेरा शरीर बिगड़ तो नहीं रहा है। चारित्र से जुड़े तो हम आत्मा के भी चिंता करने लगते हैं और हम अन्य को भी सिद्धांत लेने के लिए प्रेरित करते हैं।
मुनि वीरभद्र (विराग) जी ने कहा कि आत्मा से आत्मा द्वारा आत्मा का ज्ञान लेना हमारा उद्देश्य होना चाहिए। जिस दिन आत्मज्ञान आ जाएगा, उस दिन मोक्ष हमारे सामने नजर आएगा। एक बार आत्मा यदि “स्व” स्वभाव में आ जाए तो फिर 50 डिग्री की गर्मी में भी गर्मी नहीं लगेगी, कड़ाके की ठंड में ठंडी नहीं लगेगी।

आत्मा की दशा को प्राप्त करने पर कोई भी इच्छा बाकी नहीं रह जाती। हमें पत्नी पुत्र परिवार में सुख दिख रहा है जिस दिन सारे जीव हमें पुत्र नजर आए तब समझिये कि हमारी दृष्टि क्लीयर हो गई है, उस दिन से हमें कोई टेंशन नहीं होगा।


मुनि श्री ने कहा कि आत्मा के अंदर अनंत चारित्र गुण है। यह संबंध तो सतत बदलने वाले हैं। उन्होंने कहा कि हमारी वास्तविक दृष्टि खुली नहीं है, इसलिए हम भटक रहे हैं। हम यदि कैरेक्टर में घुस जाए तो उस करैक्टर का वास्तविक आनंद ले पाएंगे।

ठीक इसी तरह हमें आत्म सुख पाने के लिए आत्मा में प्रवेश करना होगा और यह तभी संभव होगा जब हम अपनी दृष्टि बदले और आत्मज्ञान प्राप्त करें। आत्मज्ञान प्राप्त होने पर हमें मोक्ष सामने ही नजर आएगा। यह जानकारी मीडिया प्रभारी विमल हाजरा ने दी।

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