ब्यावर राजस्थान (अमर छत्तीसगढ) 17 फरवरी।
आचार्य श्री रामेश के शिष्य शासन दीपक श्री रोहित मुनि जी म सा ने समता भवन मे अपनी अमृत देशना से फरमाया कि पापी से पापी व्यक्ति संतो के समागम से तीर जाता है जैसे अर्जुन माली तीर था,साधु संतो का समागम से जीवन बदल जाता है, दुखी व्यक्ति साधु संतो के दर्शन से दुख भुल जाता व शांति मिल जाती है।
संत संगत से सुख मिलता जीवन का कण कण खिल जाता है।जब तक शरीर स्वस्थ है तब तक धर्म अराधना कर लेनी चाहिए।समय शक्ति समझ होने तक से हमे धर्म अराधना कर लेनी चाहिए बाद मे अवसर मिले ना मिले। हमारे मन मे प्रभु भक्ति हो प्रभु का नाम हो यही भाव सदा मन मे रहे।
म सा ने कहा भजन से जीया कब तक उलझेगा संसार विकल्पो मे कितने भव बीत चुके संसार के विकल्पो मे. कर्म किसी को माफ नही करता जब तक जिनवाणी सुननी चाही तब नही सुनी जब सुनना चाह तो कानो से नही सुन पाया तब जवानी याद आयी क्योंकि जवानी मे धर्म नही कर पाये। अपनी आत्मा को सदेव जागरूक बनाये, समय चला गया तो वापस नही आयेगा, व्यक्ति बिमारी वेदना से परेशान नही होता जिनवाणी नही सुनने से परेशान होता है, भंयकर वेदना के क्षणो मे मन यही भाव हो दीक्षा लूं, समभावो से कष्ट सहू मुझमे ऐसी शक्ति दो।
इससे पहले श्री यत्नेश मुनि जी म सा ने भजन से कहा जीवन है पानी की बूंद कब मिट जाये रे हमारा जीवन पानी की बूंदो के समान कब मिट जाये पता ही नही चलेगा, वर्तमान मे भविष्य खोज रहे है, क्योंकि वर्तमान हमारा भविष्य है, मन वचन काया यह तीन चीजे पृवती है जैसा करेंगे वैसा बनेंगे कर्म बंध योग के साथ कषाय आने से दुख हावी रहता है।
म सा ने कहा आत्मा का गुण समभाव है,समभाव हटते ही कषाय पैदा हो जाता है इसलिए भीतर मे समभाव के साथ समाधी भाव होना चाहिए हर परिस्थिति मे समभाव रखना जरुरी है, चिंतन करे हर क्षण समभाव मे रहे तभी हम सहना सीखेंगे। आचार्य भगवन कहते है सहना सहना कब तक सहना जब तक जीवन तब तक सहना, चिंतन करे हमारा समभाल घट रहा या बढ रहा।
संघ प्रवक्ता
नोरतमल बाबेल
साधुमार्गी जैन संघ, ब्यावर

