महावीर जयंती पर विशेष.. अहिंसा, सत्यता, अचौर्य, ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह – भगवान महावीर के पांच अमूल्य सिद्धांत : डॉ अरिहंत जैन (पेशे से चिकित्सक एवं साहित्यकार)

महावीर जयंती पर विशेष.. अहिंसा, सत्यता, अचौर्य, ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह – भगवान महावीर के पांच अमूल्य सिद्धांत : डॉ अरिहंत जैन (पेशे से चिकित्सक एवं साहित्यकार)

बिलासपुर (अमर छत्तीसगढ़) 29 मार्च।

वर्तमान शासन नायक तीर्थंकर भगवान महावीर स्वामी सम्पूर्ण विश्व में आदर को प्राप्त हैं। चैत्र शुक्ल त्रयोदशी बड़े धूमधाम से हम सभी इस महापुरुष जन्म मनाते हैं। आज से लगभग 2625 वर्ष पूर्व, आपका जन्म वैशाली के कुंडग्राम में हुआ था, वर्तमान में यह भारतवर्ष के बिहार राज्य में स्थित है। यह सर्वविदित है कि जैन धर्म के प्रवर्तक तीर्थंकर भगवान ऋषभदेव की परम्परा में उनके पुत्र चक्रवर्ती सम्राट भरत के नाम पर” भारत “कहलाया, उसके पश्चात तेईस अन्य तीर्थंकरों के बाद अंतिम तीर्थंकर भगवान महावीर स्वामी हुए।

आज हम भगवान महावीर स्वामी एवं जैन दर्शन के प्रमुख सिद्धांतों की बात करते हैं तो यह स्पष्ट है कि इसमें अहिंसा, सत्य,अचौर्य, ब्रह्मचर्य एवं अपरिग्रह जैसे पाँच मूल सिद्धांत सम्मिलित हैं।

अहिंसा का महत्व सर्वप्रथम है, इसलिए पहला सिद्धांत अहिंसा का है। प्रत्येक जीव, जीने का अधिकार रखता है, उसे जीने देना आपका कर्तव्य है। जो व्यक्ति अपनी कषाय से पराजित हो जाता है, वही हिंसा कर्म करता है। श्रेष्ठ जन स्व, पर दोनों पर दया भाव रखते हैं। अत:करण में किंचित मात्र भी अशुभ संकल्पों,विकल्पों को उत्पन्न नहीं होने देने वाला भाव ही अहिंसा है।

दूसरों के अन्न पान में बाधा डालना, अंगों का छेदन, भेदन करना, बध बंधन करना, बलिदान करना, द्रव्य भाव प्राणों का वियोग करा देना, कर देना अथवा करने वालों की अनुमोदना करना, ये सब कार्य अहिंसा धर्म के विरुद्ध हैं अर्थात हिंसा कर्म है। आत्म हितार्थी के लिए इन सब कार्यों का त्याग करना ही श्रेष्ठ मार्ग है।

सत्यता – वस्तु के यथार्थ स्वरूप का कथन करना, विपरीत हीनाधिक कथन नहीं करना तथा साधु वचनों का बोलना सत्य धर्म है। सत्यवचन, सत्य जीवन स्वयं में ही उच्चता के शिखर का जीवन है। इसके लिए पर की प्रशंसा की आवश्यकता नहीं है जो गुण स्वयं नहीं, फिर भी उन गुणों से युक्त स्वीकारना यह असत्य व्यक्ति का जीवन है ।

गुणी जनों के गुणों को नहीं स्वीकारना, यह असत्य मन का विकल्प है और यही विकल्प गुणहीन बना देता है। जिनके वचन सद्गुणों के कीर्तन में लगते हैं, मात्र उनका ही वचन बल सम्यक सार्थक है। इसलिए जो व्यक्ति आगम के अनुकूल सत्य वचन करते हैं, उन्हें वचन सिद्धि हो जाती है।

अचौर्य – किसी की रखी हुई, पड़ी हुई, भूली हुई पर वस्तु को बिना आज्ञा के ग्रहण कर लेना, अन्य को करा देना तथा दूसरे की वीणा प्रदान वस्तु के प्रयोग करने की अनुमोदना करना चोरी है । जो ऐसा नहीं करता वह अचौर्य वृत्ति है। जहां चोरी होगी वहां हिंसा अवश्य होती है ।

अपने समय पर स्वयं का कार्य न करना भी समय की चोरी है, जैसे आपका स्वयं का धन आपको प्रिय है उसी प्रकार से अन्य जनों को भी उनका धन प्रिय है, इसलिए किसी के प्रीतिभूत धन का हरण प्राण हरण के तुल्य है। साधु पुरुष पर के घर गृह आंगन में बिना पूछे प्रवेश नहीं करते क्योंकि वह अचौर्य व्रत का पालन करते हैं।

ब्रह्मचर्य – ब्रह्मांड में यदि आत्मबल, देहबल बर्धक कोई परम औषधि है तो उसका नाम है ब्रह्मचर्य धर्म । काम शक्ति को छीनकर ब्रह्मभाव में लीन रहकर गुरु आश्रम में निवास करना ब्रह्मचर्य है। सम्पूर्ण व्रतों का राजा यदि कोई व्रत है तो वह ब्रह्मचर्य व्रत है। इसकी अभाव में, संपूर्ण व्रत गंदहीन पुष्प के समान है।

जो विद्यार्थी जीवन में इस व्रत कीकी पूर्ण रक्षा करता है, उसे सरस्वती की सिद्धि हो जाती है। वीर्य रक्षा से मस्तिष्क की रक्षा होती है, उससे मेधा शक्ति की भी वृद्धि होती है।

अपरिग्रह – दूसरे एवं सांसारिक पदार्थों के प्रति ममत्व परिणामों का होना परिग्रह है, जहां जहां इच्छा है वहां वहां परिग्रह है । चाहे पदार्थ पर अधिकार हो अथवा न हो, पर ममत्व है तो परिग्रह है। परिग्रह को पाकर अहंकार मत करो।

धन,धरती कुटुंब,परिवार, राज्य पद ये सब पूर्व कर्म के फल के उदय से मिलते हैं। तीव्र कषायों के साथ इनका भोग करने से पाप कर्म का बंध होता है। और यह पाप ही हमें भविष्य में दुख देता है। इसलिए राजा भी रंक होते देखे जाते हैं और सेवक भी राजा बनते देखे जाते हैं।

इसलिए भगवान महावीर स्वामी के इस जन्म कल्याणक की अवसर पर इस आलेख के माध्यम से में जनमानस को यही संदेश देना चाहता हूँ कि आओ आज हम प्रण लें और हिंसा, झूठ, चोरी, कुशील और परिग्रह के मार्ग पर ना चले।

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