अपनी वीर्य शक्ति को पहचाने, अपनी सोच बदले… पांचो इन्द्रिया शल्य कांटे के समान हे इससे बचे- श्री श्रुतप्रभ जी

अपनी वीर्य शक्ति को पहचाने, अपनी सोच बदले… पांचो इन्द्रिया शल्य कांटे के समान हे इससे बचे- श्री श्रुतप्रभ जी

ब्यावर राजस्थान (अमर छत्तीसगढ़) 19 अप्रैल।
आचार्य श्री रामेश के शिष्य शासन दीपक श्री श्रुतप्रभ जी म सा ने ब्रह्मचर्य पर समझाया कि हमे अपनी वीर्य शक्ति को पहचाने, जिसने ब्रह्मचर्य तप का सही तरीके से वो ही पालन कर सकता, जिसने पांचो इन्द्रियो को काम भोग मे न लगाकर उनको शल्य (कांटा) के समान समझा हो वही व्यक्तिमोक्ष मार्ग मे आगे बढ सकता है व दुर्गति होने से बचा जाता है।ब्रह्मचर्य भीतर की शक्ति को मजबूत करता है।


म सा ने कहा आज व्यक्ति काम भोगो मे डुबता जा रहा उसे दूर रहना होगा निमितो से दूर रहकर इसकी साधना टिकेगी उसकी तरफ सोचे भी नही देखे भी नही भगवान से यही प्रार्थना करे मै इस जघन्य अपराध से कैसे बचू। नही तो हमारी शांति भंग होती जायेगी और बुद्धि का नाश होता रहेगा। हाड कमजोर व भय पैदा होता जायेगा। सारी शक्ति धीरे धीरे क्षीण होती जायेगी।
इससे पहले म सा ने भगवान महावीर के उत्कर्ष धर्म मे सबसे लास्ट मे ब्रह्मचर्य तप बताया जो सब तपो मे सर्वश्रेष्ट तप होता है, आज काम भोग के लिए व्यक्ति रंगशाला जाकर भोगो मे डूबा रहता है इसके भोगने पर घर परिवार मे पता नही रहता दिन भर रंगशाला मे पडे रहते है। हमे अपनी सोच को बदले तभी पांचो इन्द्रियो को बस मे रख सकेगें, तभी हम सही धर्म कर सकेंगे।
इससे पहले महासती जी म सा ने कहा जिस व्यक्ति को आत्मा की सेवा करना जान लिया समझो उसको सबकी सेवा करना जान लिया, भगवान ऋषभ देव ने आत्मा की सेवा करने के लिए तेरह महीने तक भटकते रहे और अक्षय तृतीया पर पारणा करना हुआ तब जाकर आत्मा की सेवा हुई।हमारे आचार्य उपाध्याय प्रवर अपनी साधना से चमकते जा रहे है। हमे दूर की सोच का धैर्य अपने भीतर मे पैदा करे।
संघ प्रवक्ता
नोरतमल बाबेल
साधुमार्गी जैन संघ, ब्यावर।

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