ब्यावर राजस्थान (अमर छत्तीसगढ़) 26 मई। – निरंतर चल रहे प्रवचन श्रृंखला में आज चौथ भवन में बताया कि हमें आराधक बनना है, हम आराधक बन सकते हैं।
आराधक बनने के लिए निरंतर खुद को देखते रहो कि मुझे कहाँ सुधार करने की जरूरत है। जब तक हमें केवलज्ञान नहीं हो जाता, हम सभी को कहीं न कहीं सुधार करने की जरूरत है। उसे जानो और सुधार करने के लिए तैयार रहो।
निरंतर छोड़ने योग्य छोड़ो और करने योग्य करो। छोड़ने योग्य छोड़ने से करने योग्य करना और आसान हो जाता है। पाप के स्थान पर जानकर छोड़ने योग्य है। हम देखें कि कहीं हम पाप को पाप ही नहीं मान रहे या पाप को पुण्य मानकर या धर्म मानकर तो नहीं कर रहे हैं। राग और द्वेष आभ्यंतर परिग्रह हैं।
सुख मिलता पुण्य से, भोग की इच्छा पाप।
भोग सुखदायी लगे, पाप उदय है साफ॥
जो भी सुख-सुविधाएँ हमें मिली हैं, वे पुण्य कर्म के उदय से हैं। वहीं संसार के सुख को भोगने की इच्छा यह मोहनीय कर्म का उदय है। चाहे सुख हो, चाहे दुःख हो, हमें बनिया बुद्धि का उपयोग कर हर परिस्थिति का सदुपयोग कर उसमें धर्म की कमाई करनी है। दिशा बदलो तो दशा अपने आप बदल जाएगी।
हमें जागरूकता रखनी है कि कहीं हमारे भावों में चंचलता तो नहीं आ रही है एवं हमारी साधना निरंतर आगे बढ़ती रही।
विहार सूचना
जयगच्छाधिपति उग्र विहारी, वचन सिद्ध साधक, व्याख्यान वाचस्पति, आशुकवि बारहवें पट्टधर आचार्य प्रवर श्री पार्श्वचंद्र जी म.सा. के आज्ञानुवर्ती प्रखर वक्ता,तत्व चिंतक श्री सुमतिचंद्र जी म.सा. आदि ठाणा 2 का कल सूर्योदय के पश्चात जवाजा की ओर विहार की संभावना है। गुरुदेव का आगामी चातुर्मास जोधपुर में होने की संभावना है।
संघ के मंत्री दुलीचंद मकाणा ने बताया कि गुरुदेव ने शेष काल के अंदर ज्यादा से ज्यादा ज्ञान एवं ध्यान व आगम तत्व संबंधित चर्चा कि प्रेरणा दी। संघ मंत्री ने संघ की तरफ से कृतज्ञता ज्ञापित करते हुए गुरुदेव का गुणगान किया एवं क्षमायाचना की।

