बिलासपुर(अमर छत्तीसगढ़) 25 जुलाई । छत्तीसगढ़ में तेंदूपत्ता खरीदी, मूल्य निर्धारण और संग्रहण दर को लेकर चल रहा विवाद अब सुप्रीम कोर्ट में पहुंच गया है। छत्तीसगढ़ बिलासपुर हाई कोर्ट द्वारा राज्य सरकार की तेंदूपत्ता नीति को सही ठहराते हुए जनहित याचिका खारिज किए जाने के फैसले को चुनौती देने वाली विशेष अनुमति याचिका SLP पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकार और अन्य प्रतिवादियों को नोटिस जारी किया है।
शीर्ष अदालत ने सभी पक्षकारों को चार सप्ताह के भीतर जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया है। जस्टिस विक्रम नाथ, जस्टिस संदीप मेहता और जस्टिस आर. महादेवन की तीन सदस्यीय पीठ में मामले की सुनवाई हो रही है।
सेवानिवृत्त भारतीय वन सेवा अधिकारी कृष्ण शुक्ला ने छत्तीसगढ़ बिलासपुर हाई कोर्ट में जनहित याचिका दायर कर राज्य की तेंदूपत्ता खरीदी नीति को चुनौती दी थी। चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा और जस्टिस रवींद्र कुमार अग्रवाल की डिवीजन बेंच ने याचिका खारिज करते हुए कहा था कि सरकार की आर्थिक और नीतिगत निर्णयों में न्यायालय का हस्तक्षेप सीमित होता है।
हाई कोर्ट ने अपने फैसले में कहा था कि लघु वनोपज सहकारी संघ के माध्यम से तेंदूपत्ता व्यापार और लाभांश वितरण की व्यवस्था एक वैध सामाजिक-आर्थिक नीति है, जिसका उद्देश्य वनाश्रितों को बिचौलियों और ठेकेदारों के शोषण से बचाना है। अदालत ने यह भी माना था कि वर्ष 2009 के सरकारी आदेश को लगभग 12 वर्ष बाद 2021 में चुनौती दी गई, जो अत्यधिक विलंब का मामला है।
याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता रौफ रहीम और अनिल श्रीवास्तव ने पैरवी करते हुए कहा, छत्तीसगढ़ राज्य तेंदूपत्ता (व्यापार विनियमन) अधिनियम, 1964 के तहत निर्धारित “क्रय मूल्य” के बजाय केवल “संग्रहण दर” पर खरीदी कर रही है, जिससे तेंदूपत्ता संग्रहकों को उनका वैधानिक लाभ नहीं मिल रहा।
याचिका में यह भी कहा गया है कि वनाधिकार अधिनियम, 2006 लागू होने के बाद तेंदूपत्ता सहित गौण वनोपज पर आदिवासियों और पारंपरिक वनवासियों का अधिकार है। ऐसे में वर्ष 2009 का सरकारी आदेश उनके वैधानिक अधिकारों का उल्लंघन करता है।
सुप्रीम कोर्ट ने प्रारंभिक सुनवाई के बाद याचिका पर नोटिस जारी करते हुए छत्तीसगढ़ सरकार और संबंधित प्रतिवादियों को चार सप्ताह के भीतर जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया है। जवाब आने के बाद मामले पर आगे सुनवाई होगी।
