पहले हम शराब को पीते हैं फिर शराब हमें पीने लगती है-मुनि समयप्रभ जी… ‎टोंट मारने से न केवल हिंसा होती है बल्कि दूरियां भी बढ़ती है-श्रेयांशप्रभ जी

पहले हम शराब को पीते हैं फिर शराब हमें पीने लगती है-मुनि समयप्रभ जी… ‎टोंट मारने से न केवल हिंसा होती है बल्कि दूरियां भी बढ़ती है-श्रेयांशप्रभ जी



‎राजनांदगांव(अमर छत्तीसगढ़) 5अगस्त। जैन मुनि श्री समयप्रभ सागर जी ने कहा कि व्यक्ति पहले सोचता है कि वह शराब पी रहा है किंतु बाद में उसे शराब पीने लगती है। उन्होंने कहा कि इससे बचने के लिए हमारे भीतर पचकान (उपवास का संकल्प ) लेने का साहस होना चाहिए। पचकान का जीवन में प्रवेश हो तो उससे मत घबराओ, उसे स्वीकार करो और दृढ़तापूर्वक उसका सामना करो।
‎          मुनि श्री ने कहा कि पचकान लेने से आत्म शुद्धि होती है। मन में दृढ़ता की भावना आती है और हम व्यसन से मुक्त रह सकते हैं। आज की धर्म सभा को श्रेयांशप्रभ सागर जी ने भी संबोधित किया। उन्होंने कहा कि हमें हिंसा से बचना चाहिए। हिंसा कई तरह से होती है। इनमें से एक भाव हिंसा भी है। हम सुबह सोकर उठने से लेकर रात्रि सोते तक अनेकों बार हिंसा कर चुके होते हैं किंतु हम इसका मनन नहीं करते।
‎         उन्होंने कहा कि किसी को ठेस पहुंचाना भी हिंसा है। हम कहते हैं कि हम अहिंसक हैं, हम किसी जीव पर हिंसा नहीं करते फिर भी हम भाव से हिंसा कर देते हैं। मुनि श्री ने कहा कि हम पेन लेते हैं और उसे जेब में रखते हैं,यहां तक तो ठीक है किंतु पेन लेते समय यह भाव रहता है कि पेन को देखकर सामने वाले के मन में जलन होगी तो यह भाव हिंसा है।
‎                    मुनि श्रेयांशप्रभ सागर जी हम अपने द्वारा की गई हिंसा को संस्कारों का नाम देकर बचाना चाहते हैँ, किन्तु क्या आप अंतर मन से बोल सकते हैं कि हम यह जानबूझकर नहीं कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि आवश्यक हिंसा तो ठीक है किंतु अनावश्यक हिंसा से हमें बचाना चाहिए। बच्चों को डांटना आवश्यक है, क्योंकि इसके पीछे उनका भला है। उन्होंने कहा कि किसी को नीचा दिखाने के लिए टोंट मारना हिंसा है। उन्होंने

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