अधर्म और पाप कर्मों से मुक्ति दिलाता है वीतराग देव-शास्त्र-गुरु पर अटूट विश्वास: मुनि श्री आगम सागर जी

अधर्म और पाप कर्मों से मुक्ति दिलाता है वीतराग देव-शास्त्र-गुरु पर अटूट विश्वास: मुनि श्री आगम सागर जी

रायपुर (अमर छत्तीसगढ़) 9 अगस्त। श्री दिगम्बर जैन आदीश्वरधाम नवोदय तीर्थ समयोपदेश वर्षायोग 2026 के अंतर्गत आज दिनांक 9 अगस्त 2026 रविवार को श्री दिगम्बर जैन बड़ा मंदिर मालवीय रोड रायपुर में प्रातःकाल से ही धर्म प्रेमी बंधुओं की अपार भीड़ और विशाल उपस्थिति देखने को मिली। आज के इस पावन एवं भव्य आयोजन में विशेष रूप से श्री पद्म प्रभु जिनालय लाभांडी समाज के समस्त सदस्य एवं पदाधिकारी उपस्थित रहे।

समयोपदेश वर्षायोग समिति के अध्यक्ष नरेंद्र जैन गुरुकृपा एवं कार्यकारी अध्यक्ष संजय नायक जैन ने बताया कि आज की प्रातःकालीन वेला में भगवान का अभिषेक एवं शांतिधारा करने का परम सौभाग्य जिन पुण्यार्जक परिवारों को प्राप्त हुआ उनमें श्री प्रदीप आशा रिशु तान्या बड़जात्या परिवार लाभांडी श्री शीलचंद सुप्रीत आनन्द जैन परिवार तथा श्री कीर्तिश नितेश प्रवीण प्रतीक आशीष जैन बांसवाड़ा राजस्थान शामिल रहे।

अभिषेक और शांतिधारा के पश्चात जिनालय में गूंजते मंगलाचरण के बीच जैन संतद्वय को आहारचर्या का लाभ मिला। आज मुनि श्री आगम सागर जी महाराज एवं ससंघ को समाज के सदस्यों द्वारा आहार कराया गया।

आहारचर्या के उपरांत मुनि संघ के पावन सान्निध्य में धार्मिक कक्षाओं एवं स्वाध्याय का आयोजन संपन्न हुआ। प्रातःकाल की बेला में मुनि श्री पुनीत सागर जी महाराज ने अपनी धार्मिक कक्षा के दौरान तत्त्वार्थ सूत्र ग्रंथ के दूसरे अध्याय का बहुत ही सुंदर और गंभीर अध्ययन उपस्थित श्रावकों को करवाया। वहीं दूसरी ओर मुनि श्री आगम सागर जी महाराज ने छः ढाला ग्रंथ के दूसरे अध्याय का वाचन कर अपनी मंगल देशना व विस्तृत प्रवचन प्रदान किए।


अपने मंगल प्रवचन में मुनि श्री आगम सागर जी महाराज ने नरक गति के स्वरूप कर्मों के फल और जीवन में सच्चे धर्म के महत्व पर बहुत ही विस्तृत प्रकाश डाला। मुनि श्री ने बताया कि नरक लोक में बड़े-बड़े बिल और गुफाएं होती हैं जिनमें नारकीय जीव निवास करते हैं। इन बिलों में अत्यंत घना अंधकार रहता है और जीव एक-दूसरे को अपने अवधिज्ञान के माध्यम से देखते हैं।

नरक में अत्यधिक गर्मी लगने पर जब जीव वृक्ष की छाया में बैठने का प्रयास करते हैं तो वहां सेमर जाति के वृक्ष का वर्णन आता है जिसके पत्ते तलवार की धार के समान अत्यंत तीखे होते हैं। जैसे ही कोई जीव उस वृक्ष के नीचे बैठता है तो स्वभाववश वे पत्ते गिरकर जीव को काट देते हैं जिससे उन्हें अत्यधिक तीव्र वेदना सहनी पड़ती है।

यह सब चारों ओर किए गए हिंसात्मक कर्मों और पापकर्मों की सजा के रूप में मिलता है। किसी को बुरा-भाला बोलने या हिंसा करने पर ऐसी भयंकर सजा मिलती है। तलवार जिस प्रकार शरीर को अलग करती है वैसे ही नरक में जीवों को काटा जाता है और जब अत्यंत गर्मी व प्यास लगती है तब उन्हें असहनीय वेदना सहन करनी पड़ती है।


मुनि श्री ने आगे समझाया कि झूठ बोलना, पराई स्त्री पर कुदृष्टि रखना और देव-शास्त्र-गुरु की निंदा करना—ये सात व्यसन जीव को सीधे सातवें नरक में ले जाने वाले मार्ग हैं। धर्म के मामलों में कभी भी थोड़ा भी बंटवारा या संशय नहीं होना चाहिए। रागी जीवों पर नहीं बल्कि वीतरागी सर्वज्ञ भगवान पर हमेशा सौ प्रतिशत अटूट विश्वास होना चाहिए क्योंकि हमारे भगवान अठारह दोषों से रहित पूर्णतः वीतरागी होते हैं।

दिशाओं को ही अपना अम्बर बनाने वाले दिगंबर संतों और सच्चे देव-शास्त्र-गुरु को मानने वाला जीव कभी नरक नहीं जाता जबकि मिथ्यात्व और झूठी मान्यताओं को मानने वाला जीव ही नरक की ओर गति करता है।

प्रवचन के अंत में मुनि श्री ने बताया कि नरक में भयानक गर्मी और भयंकर ठंड दोनों का अहसास होता है और सातवें नरक में तो केवल ठंड ही ठंड होती है। इन सभी दुखों और वेदानाओं को हम सभी पूर्व भव में सहन करके आ चुके हैं इसलिए इस दुर्लभ मनुष्य जन्म को पाकर पुनः वही पापकर्म न करें। जो लोग सच्चे भाव से धर्म और मुनि सेवा के मार्ग से जुड़ते हैं वे कभी भी दुर्गतियों में नहीं जाते। इस प्रकार आज का यह पूरा धार्मिक आयोजन और संतों का सान्निध्य रायपुर जैन समाज के लिए अत्यंत प्रेरणादायी और मंगलकारी रहा।

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