ब्यावर राजस्थान (अमर छत्तीसगढ़) 9 अगस्त । जिनशासन गौरव प्रज्ञानिधि, युगपुरूष आचार्य श्री विजयराज जी म.सा. ने रविवार को ओस्तवाल एकेडमी में आयोजित विशेष प्रवचन में कहा कि परिवार में रहकर भी व्यक्ति अध्यात्म को समय दे सकता है। इसके लिए टाइम मैनेजमेंट जरूरी है। पूरे दिन के 24 घंटों में से महज कुछ घंटे आध्यात्म को देकर व्यक्ति अपना जीवन सफल बना सकता है। परिवार में रहकर भी आध्यात्मिक जीवन जीया जा सकता है।
संतों का जीवन प्रकृति परक होता है। वे संसार में रहते है, लेकिन रमते नहीं। जो संसार में रहकर रमता है वह व्यक्ति संसारी है। परिवार की जिम्मेदारी में रहते हुए व्यक्ति अध्यात्म को समय देकर अपना कल्याण कर सकता है। इसके लिए व्यक्ति को टाइम मैनेजमेंट करना होगा।
- म.सा. ने कहा दृष्टि और दृष्टिकोण में काफी अंतर है। * व्यक्ति जब एक वीजन लेकर चलता है तो उसे वह प्राप्त भी हो सकता है। संतों का जीवन निष्पक्ष, निर्दोष, निश्चिंत होता है।
जब व्यक्ति के पुण्य उदय होते है, तब सत्संग मिलता है। वहीं अगर पापों का उदय होता है तब अस्पताल के चक्कर काटने पड़ते है। बिना पुण्य के सत्संग नहीं मिलता। जब कोई श्रद्धा से सत्संग में जाता है तब ज्ञान का उदय होता है। ज्ञान-वैराग्य से वीतरागी बनता है। खुद पर अनुशासन से आत्मानुशासन होता है।
- उन्होंने प्रवचन के दौरान कहा कि यह जीवन केवल कमाने और खाने के लिए नहीं मिला है, इसमें हमें परमात्मा की प्राप्ति के प्रयास करने चाहिए।

