आत्म उत्क्रांति आध्यात्मिक चातुर्मास-2026… विषयों में बढ़ती आसक्ति व्यक्ति के विवेक को कर देती है कमजोर : साध्वी मंजुलाश्रीजी

आत्म उत्क्रांति आध्यात्मिक चातुर्मास-2026… विषयों में बढ़ती आसक्ति व्यक्ति के विवेक को कर देती है कमजोर : साध्वी मंजुलाश्रीजी

रायपुर(अमर छत्तीसगढ़) 9 अगस्त । आत्म उत्क्रांति आध्यात्मिक चातुर्मास-2026 के अंतर्गत श्री जिनकुशलसूरि जैन दादाबाड़ी में अध्यात्म सार ग्रंथ का पठन करते हुए रविवार को साध्वी मंजुलाश्रीजी म.सा. ने कहा कि आजकल हर व्यक्ति भविष्य की प्लानिंग करके चलता है। कल क्या करना है, इसकी तैयारी भी आज से ही शुरू कर दी जाती है, लेकिन जीवन में संयम और विवेक रखना भी उतना ही जरूरी है।

साध्वीश्री ने एक राजा का प्रसंग सुनाते हुए बताया कि एक राजा गंभीर रूप से बीमार पड़ गया। कई वैद्य और हकीमों के उपचार के बाद भी उसकी बीमारी का पता नहीं चल सका। स्थिति बिगड़ने पर मंत्री एक अनुभवी वैद्य को लेकर आया। वैद्य ने नाड़ी देखकर बीमारी पहचान ली और उपचार शुरू करने से पहले राजा के सामने एक शर्त रखी। उसने कहा कि राजा स्वस्थ तो हो जाएंगे, लेकिन उन्हें जीवनभर आम नहीं खाना होगा।

राजा आम के शौकीन थे, लेकिन उस समय आम का मौसम नहीं होने के कारण उन्होंने वैद्य की शर्त स्वीकार कर ली। कुछ समय बाद राजा पूरी तरह स्वस्थ हो गए। आम का मौसम आने पर राजमहल का बगीचा आम की खुशबू से महकने लगा। राजा के मन में आम खाने की इच्छा जाग उठी। उन्होंने मंत्री के मना करने के बावजूद आम के बगीचे और फिर वन की ओर जाने की जिद की।

वन में आम के पेड़ों के बीच पहुंचने पर राजा एक पेड़ के नीचे बैठ गए। इसी दौरान हवा चलने से एक आम उनके पास आ गिरा। मंत्री ने उन्हें बार-बार आम खाने से रोका, लेकिन राजा ने संयम नहीं रखा और आम खा लिया। आम खाते ही उनकी तबीयत बिगड़ गई और कुछ ही क्षणों में उन्होंने प्राण त्याग दिए।

साध्वीश्री ने कहा कि राजा ने अपनी इच्छा पर संयम नहीं रखा और उसकी कीमत जीवन देकर चुकानी पड़ी। इसी प्रकार मनुष्य को उन पदार्थों और विषयों से सावधान रहना चाहिए, जिनमें अत्यधिक मूर्छा और आसक्ति उत्पन्न होती है। विषयों के प्रति बढ़ती आसक्ति व्यक्ति के विवेक को कमजोर कर देती है और अंततः वही आसक्ति उसके पतन का कारण बन सकती है।

उन्होंने कहा कि जीवन में केवल भविष्य की योजना बनाना पर्याप्त नहीं है, बल्कि अपनी इच्छाओं और इंद्रियों पर नियंत्रण रखना भी आवश्यक है। जिस व्यक्ति में संयम और विवेक होता है, वही विपरीत परिस्थितियों में भी स्वयं को संभाल सकता है। इसलिए धर्म के मार्ग पर चलते हुए मोह और आसक्ति को कम करने का निरंतर प्रयास करना चाहिए।

इस अवसर पर श्री ऋषभदेव मंदिर ट्रस्ट के अध्यक्ष विजय कांकरिया, कार्यकारी अध्यक्ष अभय कुमार भंसाली, आत्म उत्क्रांति आध्यात्मिक चातुर्मास-2026 समिति के अध्यक्ष बसंत लोढ़ा, महासचिव मुकेश निमाणी, सह-सचिव अभिषेक गोलछा एवं कोषाध्यक्ष चिंतन मालू सहित बड़ी संख्या में श्रद्धालु एवं समाजजन उपस्थित रहे।

आत्म उत्क्रांति आध्यात्मिक चातुर्मास-2026 के अंतर्गत दादाबाड़ी में अध्यात्म सार ग्रंथ का पठन करते हुए रविवार को साध्वी मंजुलाश्रीजी म.सा. ने कहा कि आजकल हर व्यक्ति आगे की प्लानिंग करके चलता है। कल क्या करना है, यह भी आज ही तय कर लिया जाता है, लेकिन जीवन में संयम और विवेक की योजना बनाना भी उतना ही जरूरी है।

साध्वीश्री ने एक राजा का प्रसंग सुनाते हुए बताया कि एक राजा बीमार पड़ गया। कई वैद्य और हकीमों के उपचार के बाद भी उसकी बीमारी का पता नहीं चल सका। स्थिति बिगड़ने पर मंत्री एक अनुभवी वैद्य को लेकर आया। वैद्य ने नाड़ी देखकर बीमारी पहचान ली और कहा कि राजा ठीक हो जाएगा, लेकिन उसे एक शर्त माननी होगी। राजा ने शर्त स्वीकार कर ली और उपचार शुरू हुआ। धीरे-धीरे राजा पूरी तरह स्वस्थ हो गया।

स्वस्थ होने के बाद वैद्य ने राजा को चेतावनी दी कि वह जीवन में कभी आम न खाए, क्योंकि आम खाने से उसकी बीमारी फिर उभर सकती है। राजा आम का शौकीन था, लेकिन उस समय आम का मौसम नहीं होने के कारण उसने वैद्य की बात मान ली।

कुछ समय बाद आम का मौसम आया। राजमहल का आम का बगीचा खुशबू से महकने लगा। राजा से रहा नहीं गया और वह मंत्री के साथ आम के बगीचे में पहुंच गया। मंत्री लगातार राजा को आम खाने से रोकता रहा, लेकिन राजा नहीं माना। इसी दौरान हवा से एक आम उसके पास आ गिरा। राजा ने मंत्री की बात अनसुनी कर आम खा लिया। आम खाते ही उसकी तबीयत बिगड़ गई और कुछ ही समय में राजा ने प्राण त्याग दिए।

साध्वीश्री ने कहा कि राजा ने संयम नहीं रखा और उसकी कीमत उसे अपने प्राण देकर चुकानी पड़ी। इसी प्रकार जिन पदार्थों और विषयों में अधिक मूर्छा और आसक्ति होती है, उनसे मनुष्य को बचना चाहिए। आसक्ति बढ़ने पर विवेक समाप्त होने लगता है और व्यक्ति उसी मोह में बंधता चला जाता है।

उन्होंने कहा कि मनुष्य को अपनी इच्छाओं पर नियंत्रण रखना चाहिए। केवल भविष्य की योजना बनाना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि वर्तमान में संयम, विवेक और धर्म के मार्ग पर चलना भी जरूरी है। विषयों से दूरी और आत्मसंयम ही जीवन को सही दिशा प्रदान करते हैं।

इस अवसर पर श्री ऋषभदेव मंदिर ट्रस्ट के अध्यक्ष विजय कांकरिया, कार्यकारी अध्यक्ष अभय कुमार भंसाली, आत्म उत्क्रांति आध्यात्मिक चातुर्मास-2026 समिति के अध्यक्ष बसंत लोढ़ा, महासचिव मुकेश निमाणी, सह-सचिव अभिषेक गोलछा एवं कोषाध्यक्ष चिंतन मालू सहित बड़ी संख्या में श्रद्धालु उपस्थित रहे।

48 दिवसीय सम्मेत शिखर तप साधकों के लिए 2 से 10 अक्टूबर तक दर्शन

आत्म उत्क्रांति आध्यात्मिक चातुर्मास-2026 के अंतर्गत 48 दिवसीय सम्मेत शिखर तप करने वाले साधकों के लिए समिति की ओर से श्री सम्मेत शिखरजी के दर्शन की तिथियां 2 से 10 अक्टूबर तक निर्धारित की गई हैं। इस दौरान तप साधक सम्मेत शिखर महातीर्थ की प्रतिकृति के दर्शन एवं आराधना का लाभ लेंगे।

समिति के अनुसार इस अवसर पर सम्मेत शिखर महातीर्थ की प्रतिकृति में स्वर्ण स्तम्भ, रजत स्तम्भ एवं कांस्य स्तम्भ के लाभार्थी श्रद्धालु भी आगे आकर अपना बहुमूल्य योगदान दे रहे हैं। तप, दर्शन और आराधना के इस आयोजन को लेकर श्रद्धालुओं में उत्साह बना हुआ है।

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