आत्म उत्क्रांति आध्यात्मिक चातुर्मास-2026… संयम, समर्पण और विवेक से जीवन को बनाएं सार्थक: साध्वी मंजुला श्रीजी

आत्म उत्क्रांति आध्यात्मिक चातुर्मास-2026… संयम, समर्पण और विवेक से जीवन को बनाएं सार्थक: साध्वी मंजुला श्रीजी

रायपुर(अमर छत्तीसगढ़) 18 अगस्त । आत्म उत्क्रांति आध्यात्मिक चातुर्मास-2026 के अंतर्गत दादाबाड़ी में अध्यात्म सार ग्रंथ का पठन करते हुए प्रवचन प्रभाविका साध्वी मंजुला श्रीजी म.सा. ने विभिन्न प्रसंगों के माध्यम से जीवन को धर्म, संयम, विवेक, कृतज्ञता, समर्पण और आत्मचिंतन से जोड़ने का संदेश दिया। उन्होंने कहा कि समय अनमोल है और किसी के लिए रुकता नहीं। इसलिए जीवन के प्रत्येक क्षण का सदुपयोग प्रभु भक्ति और आत्मकल्याण में करना चाहिए।

साध्वीश्री ने कहा कि आज व्यक्ति भविष्य की प्लानिंग तो करता है, लेकिन अपने जीवन में संयम और धर्म की योजना बनाना भूल जाता है। इच्छाओं और विषयों के पीछे भागने से मनुष्य की व्याकुलता बढ़ती है, जबकि अपने भीतर झांकने की व्याकुलता और साधना के प्रति समर्पण आवश्यक है। हनुमानजी और माता सीता के सिंदूर के प्रसंग के माध्यम से उन्होंने समझाया कि सच्चा समर्पण अहंकार को छोड़कर प्रभु के प्रति पूर्ण निष्ठा रखने से आता है।

उन्होंने चिंतन और मनन की महत्ता बताते हुए कहा कि सही दिशा में किया गया चिंतन व्यक्ति को ऊंचाइयों तक पहुंचा सकता है। दूसरों की अपेक्षाएं पूरी करने का भाव मैत्री भाव है और सम्यक दर्शन की सम्मुखता होने पर जीवन में मैत्री का उदय होता है। व्यक्ति को अपनी भूल तुरंत स्वीकार करना सीखना चाहिए। ‘मिच्छामी दुक्कड़म’ केवल शब्द नहीं, बल्कि अपनी भूल को अंत:करण से स्वीकार करने का भाव है।

साध्वीश्री ने कृतज्ञता और माता-पिता के प्रति विनय पर भी जोर दिया। उन्होंने कहा कि बच्चों को माता-पिता के बुढ़ापे में सहारे की लाठी बनना चाहिए, लाठी चलाने वाला नहीं। उन्होंने अपनी योग्यता बढ़ाने, तिरस्कार को कड़वे घूंट की तरह सहने, दूसरों के व्यवहार का अवलोकन करने और मौलिक गुणों के साथ पुण्य अर्जित करने की प्रेरणा दी।

उन्होंने कहा कि जीवन की कीमत हम स्वयं तय करते हैं। मनुष्य शरीर अत्यंत दुर्लभ है और इसका उद्देश्य आत्मकल्याण तथा मोक्ष की दिशा में आगे बढ़ना है। इसके लिए इंद्रियों पर विजय, अनुशासन और विवेक जरूरी है। स्वभाव को बदलने में समय नहीं लगता, लेकिन उसे बिगाड़ने में भी देर नहीं लगती। इसलिए व्यक्ति को पहले स्वयं अनुशासित होकर जीवन को अनुशासन में रखना चाहिए।

इस अवसर पर श्री ऋषभदेव मंदिर ट्रस्ट के अध्यक्ष विजय कांकरिया, कार्यकारी अध्यक्ष अभय कुमार भंसाली, ट्रस्टी नरेश बैद्मुथा, राजेंद्र गोलछा एवं उज्ज्वल झाबक तथा आत्म उत्क्रांति आध्यात्मिक चातुर्मास-2026 समिति के अध्यक्ष बसंत लोढ़ा, महासचिव मुकेश निमाणी, सह-सचिव अभिषेक गोलछा एवं कोषाध्यक्ष चिंतन मालू सहित बड़ी संख्या में श्रद्धालु उपस्थित रहे।

विजय संचेती जी का श्रीसंघ ने किया बहुमान

तप, जप और आराधना के क्रम में आज मास खमण के तपस्वी विजय जी संचेती का श्रीसंघ की ओर से बहुमान किया गया।

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