राजनांदगाव(अमर छत्तीसगढ़) 31अगस्त। खरतर गच्छाधिपति मणिप्रभ सागर जी के सुशिष्य समयप्रभ सागर जी ने कहा कि आप जिस भी अनुष्ठान को करते हैं उसके प्रति आपकी पूरी और सच्ची श्रद्धा होनी चाहिए। आप तप तो करते हैं लेकिन आपका ध्यान पारणा की ओर होता है, इससे हमारे तप का समुचित लाभ हमें नहीं मिल पाता।
मीडिया प्रभारी विमल हाजरा ने बताया कि ज्ञान वल्ल्भ उपाश्रय भवन में चल रहे चातुर्मासिक प्रवचन की कड़ी में आज मुनि श्री समयप्रभ सागर जी ने कहा कि हम कोई भी जप – तप करें, उसे पूरी निष्ठा से करें। हम इन्द्रियों का पोषण ना कर, उनका शोषण करना सीखे। इंद्रियों के प्रति आसक्ति ही हमें अपने मार्ग से भटकाती है।
मुनि श्री समयप्रभ जी ने कहा कि हमें व्यवहार में जीना होता है और व्यवहार के द्वारा ही हम लोगों को संदेश दे सकते हैं। तप का लाभ तभी मिल सकता है जब हम इंद्रियों का शोषण करें। उन्होंने कहा कि हम इंद्रियों के शोषण की जगह पोषण करने लग जाते हैं। तप करते हैं लेकिन हमारा ध्यान पारणा की ओर रहता है। यही वजह है कि हमें अपने तप का समुचित लाभ नहीं मिल पाता।
मुनि श्री ने कहा कि भोजन का संस्कार तो हमें जन्मों से मिला हुआ है। समझदार व्यक्ति इंद्रियों के प्रति आसक्ति से बचते हैं। आप अपने तप पर आस्था रखें। आस्था ही अपने आप पर नियंत्रण रखता है। उन्होंने कहा कि जागृत बनो और परमात्मा की वाणी का चिंतन करो तब आप निश्चित की अपने लक्ष्य में सफल होंगे।

