राजनांदगांव(अमर छत्तीसगढ़) 1 सितंबर। “कुछ पाने के लिए किया गया सौदा व्यापार होता है किंतु माता-पिता भाई बहनों के साथ कोई लेनदेन व्यापार नहीं होता। किसी पर इच्छा थोपना गलत है। आप कुछ पाने की इच्छा के साथ कोई कार्य करते हैं और वह प्राप्ति आपको नहीं मिल पाती तो आप उसे सैक्रिफिस (त्याग)का रूप दे देते हैं, जबकि यह त्याग नहीं होता।”
उक्त उदगार खरतर गच्छाधिपति मणिप्रभ सागर जी के सुशिष्य श्रेयांशप्रभ सागर जी ने आज जैन बगीचा स्थित ज्ञानवल्लभ उपाश्रय भवन में व्यक्त किये। उन्होंने कहा कि हम जो करते हैं,वह अपनी इच्छा से और अपने लिए करते हैं। यदि हम निस्वार्थ भाव से किसी के लिए कुछ करते हैं तभी सही मायने में हम सैक्रिफिस कर पाएंगे। उन्होंने कहा कि हम अपनी जिंदगी में स्वार्थ को निस्वार्थ मानते हैं,यही मिथ्यात्व है।
मुनि श्री श्रेयांशप्रभ जी ने कहा कि सुबह से उठकर रात्रि में सोते समय तक हम जो करते हैं,उस पर विचार करें कि हमने क्या सही किया और क्या गलत किया। यदि प्रतिदिन यही विचार कर रहे हैं तो निश्चित है कि हमारी दृष्टि में सुधार आएगा। हमें जो भौतिक चीज मिलती है उसे हम अपने साथ रखना चाहते हैं किंतु जो आत्मा को पोषण करने वाली चीज मिलती है, उसे हम अपने साथ नहीं रखना चाहते।
उन्होंने कहा कि त्याग की भावना तो हमारे दिल से निकल चुकी है। हर व्यक्ति यह मानता है कि वह सेक्रिफिस कर रहा है, किंतु यह सोंचे कि क्या हम सही हैं!
जैन मुनि ने आगे कहा कि बिना छोड़ें त्याग नहीं हो सकता। हमारे लिए सैक्रिफिस का मतलब इच्छाएं मारना है। क्या हम कोई कार्य इच्छा मारकर करते हैं या फिर इच्छा से करते हैं, इस पर विचार करें। हम जो शब्द बोल रहे हैं उसका मतलब भी वही होना चाहिए। हमारी बातों से गलतफहमी नहीं होनी चाहिए।
यदि ऐसा होता है तो हमारा भविष्य भी संवर जाएगा और वर्तमान भी संवर जाएगा। इच्छा को इच्छा ही रहने दीजिए,उसे सैक्रिफिस मत बनाइए। यह जानकारी मीडिया प्रभारी विमल हाजरा ने दी।

