‎छोटे हो या बड़े सबके लिए विनय‎भाव होना चाहिए- श्रेयांशप्रभ जी‎

‎छोटे हो या बड़े सबके लिए विनय‎भाव होना चाहिए- श्रेयांशप्रभ जी‎



‎राजनांदगांव(अमर छत्तीसगढ़) 13 सितम्बर। ” छोटे हो या बड़े सबके लिए विनय भाव होना चाहिए। जहां सुगंध होगा वहीं जीव आने ही लगते हैं। विनयवान व्यक्ति को लोग पसंद करते हैं, इसलिए हमें नम्र और विनयवान होना चाहिए।!” उक्त उदगार खरतर गच्छाधिपति मणिप्रभ सागर जी के सुशिष्य श्रेयांशप्रभ सागर जी ने आज जैन बगीचा स्थित नये हाल में संवत्सरी पर्व के छठवें दिन अपने नियमित प्रवचन में व्यक्त किए।


‎               मुनि श्री श्रेयांशप्रभ जी ने कहा कि किसी भी तीर्थंकर की दीक्षा नवलोकान्तिक देव की अनुमति के बिना नहीं हो सकती । उन्होंने कहा कि परमात्मा किसी को माप तोलकर तो नहीं देते बल्कि उनके पास जो आता है उसे दिल खोल कर देते हैं। पचकान हम लेते हैँ,भाव लेने के लिए। परमात्मा के पास तो पहले से ही भाव है इसलिए उन्हें पचकान लेने की आवश्यकता नहीं है।


‎ मुनि श्री श्रेयांशप्रभ जी ने कहा कि टाइम की जरूरत केवल मन को होती है, शरीर को नहीं। शरीर को आप जब भी आदेशित करें, वह काम करने के लिए तैयार हो जाता है, वह समय नहीं देखता। आजादी मिल जाए तो हम एक जगह टिकते नहीं। लोग जब तक मतलब रहता है तब तक एक दूसरे से जुड़े रहते हैं। हर जीव को अपने कर्म खुद के पुरुषार्थ से बनाना पड़ता है।


‎ मुनि श्री ने कहा कि भले ही हमारे ऊपर किसी का क्रोध भरा भाव हो लेकिन हमें शांत रहना चाहिए। सामने वाला व्यक्ति कैसा भी आचरण करें लेकिन आपका आचरण ऐसा होना चाहिए कि सामने वाले का व्यवहार आपके प्रति बदल जाए और वह आपके प्रति विनयवान हो जाए।

उन्होंने कहा कि हमारे द्वारा छोड़ी गई ऊर्जा यदि शुद्ध होती है तो सामने वाले का भाव बदल जाता है। मन में गलत विचार आते हैं लेकिन आप उन्हें कभी टिकने ना दें। श्रद्धा जानकर होती है बिना जाने नहीं। आप जब तक किसी को नहीं जानते तब तक आपके मन में श्रद्धा उत्पन्न नहीं हो सकती। यह जानकारी चातुर्मास समिति के संयोजक पीयूष बैद एवं गुलाब गुलाब गोलछा ने दी।

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